फन्दे की गांठ!

शोहरत की बाहों में बाहें मेरी,
भीड़ इंतज़ार में बाहर खड़ी!
इक झलक पाने को बेताब मेरी!
नाचे मयूर देख सावन-झड़ी!

अनजान, अजनबी, रिश्तेदार मेरे, 
ऐरा-गैरा, नत्थू-खैरा, खड़ा द्वार मेरे,
चाहनेवालों की थी फ़ेहरिश्त बड़ी!
हया-शर्म छोड़ जोड़े है कडी!

निःशब्द मैं, विशाल दरख़्त सा,
आम्रमंजिरी में गाती कारी कोयल सा!
विनम्र हो मैं झुका अभिवादन में,
फल-फूल से लदे आम्रवृक्ष सा!

बसंत के आगमन का बड़ा बोलबाला,
प्रकृति ने ओढ़ा, रंगबिरंगी दुशाला!
शोहरत की बुलंदियाँ, होठों पे हाला,
नशा चढ़ा ज्यूँ-ज्यूँ, रीता था प्याला!

ज्वार-भाटा सा उतरा मौजों का खुमार!
साहिल से लौटी लहर रूठ बार-बार!
जाम खाली, जेब खाली, हुजूम गायब!
तन्हाईयों में सिर्फ सायें साथ अब!

साथी-रहनुमा-हमदर्द न दोस्त मेरा,
वक़्त पलटा, स्वजनों ने दुश्मनों सा घेरा!
कारवाँ धूल के गुबार में कहीं खो गया!
सूखे पत्तों का दरख़्तों से नाता टूट गया!
खामोशियाँ, गुस्ताखियाँ, प्यारी सखियाँ!
अतीत का जलवा याद कर रोती अखियाँ!

अवसाद के भूत-पिशाच, करे स्वैर तांडव!
मौत के दानव से बचे कैसे हारा मानव?
बिछड़ी थी किस्मत, बिछड़े सगे संबंधी!
उम्मीदें न हसरतें, सिर्फ फंदे की गांठ बंधी!

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |
 


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