मिट्टी के अक्षय दीप से.
दीप-मालाएं जगमगानी चाहिएं ….
गर्म राख में उठी चिंगारी से,
क्रांति-मशाल जलनी चाहिए …||१||
उम्मीदों की कुंकुम-देहरी पर,
सहस्त्र स्वस्तिक उभरने चाहिएं ...
आँगन के तुलसी वृंदावन में,
स्वप्न-दीप जलने चाहिएं ||२ ||
घर-आँगन सजी अल्पना से ..
फलक पर इन्द्रधनु उभरना चाहिए!
आँगन में खड़े पारिजात पर,
श्वेत-केशरी कुसुम खिलने चाहिए! ||३ ||
बून्द-बून्द से सिंचित धरा पर ,
स्वेद-बूंदों की बरसात चाहिएं।
रत्नगर्भा धरती की कोख से
असंख्य अंकुर पनपने चाहिएं ….||४ ||
खुंट से उपेक्षित वृक्ष पर भी,
नव कोंपलें मुस्कुरानी चाहिएं ….
किनारे की भीगी रेत से,
उन्नत महल बनने चाहिएं ….||५ |
सागर में उछलती लहरों पर
स्वप्न-नौकाएं डोलनी चाहिए
ब्रह्माण्ड के गर्भ में पलते,
अनबुझी पहेलियाँ सुलझनी चाहिएं ||६ ||
रुपहले बादलों की ठुठ्ठी पर,
नजरबट्टू काला तिल होना चाहिए,
जिंदगी की दुरिह मैराथन में
जीत की वरमाला पहननी चाहिए ||७||
महत्वकांक्षाओं का लावा,
ज्वालामुखी बन धधकना चाहिए।
पत्थरों के बीच मुस्कुराता,
टुकुर-टुकुर निहारता गुल चाहिए ||८||
सुवर्ण रश्मियाँ बिखेरता सूर्य,
प्राची को चूम मुस्कुराना चाहिए,
अग्निपंख लगे परिंदों की,
हिमशिखरों पर नज़र चाहिए ||९ ||
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।