जीवन की आपाधापी में, उलझी रिश्तों की डोरी!
मन व्याकुल लुकाछिपी में, फिज़ा में धुंध भारी!
कौन अपना, कौन पराया, मन में खींचतान जारी!
गुरु चरण रज माथे धरूं, कृपा निधान! कृपा न्यारी!
पल-पल बदले भाव-भंगिमा, कभी अमावस, पूनम का चंद्रमा!
दौलत, शोहरत की भूल-भुलैया, चकाचौंध में भ्रमित जग सारा!
रंग बदलती दुनिया का, अविस्मरणीय, अद्वितीय नज़ारा!
गुरु चरण कमल का हैं सहारा, विनीत हूं मैं प्रभु थारा!
अंधकार में ज्ञान ज्योति जला, जग रोशन कर दो सारा!
भटक रहा हैं जीव बेचारा, भवसागर में मारा-मारा!
उपदेशामृत की वर्षा कर दो, बहने दो अमिरस धारा!
गुरु चरण बिन ठोर कहां, धुलने दो मन मैल सारा!
जग निर्झरी, कठोर बहुत हैं, षड़ रिपु का अक्षुण्ण स्त्रोत हैं!
शनि की दृष्टि सदा वक्र हैं, राहू केतु का दुष्ट चक्र हैं!
कर्म की लकीरों का, समय पर सदा जोर हैं!
गुरु दर्शन, चरण वंदना से, तीनों लोकों में भोर हैं!
ब्रह्माण्ड की रहस्यमई दुनिया, जीव सारे हैं कठपुतलियां!
रंगमंच के हैं रंगकर्मी, रचाए रास, बजा बांसुरियां!
निराकार, निर्गुण, स्वरूपा, गुरु मिला दे ॐकार स्वरूपा!
गुरु चरण मुक्ति दाता, पद पंकज रज चंदन रूपा!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, पवई, मुंबई, महाराष्ट्र, भारत!