लेकर एक नया रूप वो जब जब एक परिवार में आई है...
हां.. वो एक बेटी... एक बहन.. एक पत्नी... या एक मां कहलाई है...
वैसे तो सब लोगों की जिम्मेदारी है उसके कंधों पर.. लेकिन फिर भी वो रहती सब के लिए पराई है...
सशक्तिकरण के नाम पर वो समाज से उन मुद्दों पर भिड़ती आई है...
जो सबको आसानी से मिल जाता है उस जनम के लिए भी वो कोख से ही लड़ती आई है...
ज़माने से लड़ने क्या बैठे हर मुद्दे पर.. उसकी खुद की होती हर रोज़ खुद से एक नई लड़ाई है...
कहने को आज की नारी समाज में ऊंचा स्थान रखती है क्या सब के दिल में वो घर कर पाई है..
उसकी इच्छाएं उसके सपने सब कुर्बान कदम कदम पर किए जाते हैं..
न करे तो इल्ज़ाम कि देखो कैसी उड़ने की ख़ुमारी इसपर छाई है..
कमी ये केवल समाज की नहीं खुद नारी ही नारी की दुश्मन बन आई है...
जिन्होंने अपना जिस्म खोल रास्तों पर देखो कैसे तबाही मचाई है..
सशक्तिकरण के नाम पर वो अपनी मनमानी करती आई हैं...
और इसी कारण से घर के किसी बंद कोने में रोज़ बैठी एक नारी कुर्लाई है..
जो उड़ना चाहती थी अपने सपनों की एक उड़ान आसमान में..
उसकी ज़ुबां आज की इस so called सशक्त नारी ने ही चुप कराई है..
अरे ऐ आज की नारी तूने ये कौन सी सशक्तिकरण की दुनिया दिखाई है..
याद करो वो संज्ञा मातृवत पारदरेशु की जो हमारी संस्कृति ने हमें बताई है...
सच कहना हाथ दिल पर रख के क्या हर स्त्री में तुम्हें बहन बेटी या मां नजर आई है...
हम हैं उस इतिहास से जहां सब देवताओं ने मिल कर रक्षा करने को देवी मां से गुहार लगाई है...
कभी मुसीबत में सब का पालन करने को एक नारी मदर टेरेसा बन कर आई है...
कभी बन कर आई लक्ष्मी बाई ने सशक्तिकरण की महत्ता दिखाई है...
एक तंज आज की नारी पर कि सशक्तिकरण केवल खुद के लिए नहीं समाज के लिए इस्तेमाल करो..
स्वतंत्रता के नाम पर मत तुम संस्कृति को बेहाल करो..
अपने अंग प्रदर्शन कर ना हर नारी को सरे आम करो तुम
तुम मां हो बेटी हो बहन हो तो ज़रा थोड़ी आंखों में भी लाज धरो तुम...