भाग १५
कल का सूरज वैदेही, वज्र और यश के जीवन में नई सुबह लेकर आनेवाला था। रात सितारों से जगमगा रही थी। चाँद अपने शबाब पर था, दिल खोल कर नूर बरसा रहा था....चन्द्रमा की शीतलता और जाड़े की सर्द रात का तालमेल बेमिसाल था। वैदेही मानों उसमें आकंठ डुब कर दिल खोल कर नहा रही थी... मन पर चढ़ी अतीत की परत को हटाने की भरसक कोशिश कर रही थी लेकिन क्या इतना आसान था वह?
ज़िन्दगी में आगे बढ़ने के लिए, जीवन वृक्ष पर नई कोंपलों को जन्म देने के लिए पुराने शूलनुमा पत्तों को मन की डाल से झटकना जरुरी था। वह इसी पशोपेश में थी कि इस मुश्किल काम को कैसे किया जाय? जीवन की कंटिली झाड़ियों में उलझा वर्तमान कैसे बचाया जाय?
नींद भी बड़ी बेरहम होती है। जब हम उसका स्वागत करने को तैयार खड़े होते है तो वह फूल पर बैठी चंचल तितली सी दूर-दूर भागती है। अवचेतन मन न जाने कहाँ-कहाँ भटक आता है बंजारे सा और कुछ पल ठहर कर फिर निकल पड़ता है, अनजान मंजिल की ऒर....
रात गहराती जा रही थी और नींद थी कि मुँह फुला कर बैठी थी... वैदेही ने स्टडी टेबल पर पड़ी डायरी उठाई... सोचा.. पड़ते-पड़ते आँखें थक जाएगी तो पलकें सीपी सी बंद हो जाएगी...
वह डायरी के पन्ने पालटने लगी... पहले ही पन्ने पर विनय की नेपाली टोपी पहने, एक हाथ में कटार लिए फोटो देख वह मन ही मन मुस्कुराने लगी... गज़ब का खिंचाव था उसके व्यक्तित्व में! जैसे-जैसे वह एक-एक पन्ना पलटती गई, उसके मन में तूफान मचाती एक-एक गलतफ़हमी दूर होती गई।
विनय 'मम्माज बॉय' था! कोई पाती ऐसी नहीं थी जिसमें उसकी माँ और उसकी बचपन की साथी 'मिली' का जिक्र नहीं था! पापा का उल्लेख कहीं-कहीं आदर से जरूर था मगर माँ से वह कोई बात नहीं छुपाता था। ऐसा ही प्रतीत हो रहा था डायरी पढ़ने के बाद! डायरी में मुम्बई के सभी मित्रों का जिक्र था...डायरी का हर पन्ना उसकी सफलता की कहानी बयाँ कर रहा था।
'मिली' उसका पहला प्यार था.. उसके लावण्य का वर्णन पढ़ कर वैदेही को उसकी रुमानियत, मासूमियत और प्यार की गहराईयों का एहसास ऐसे हो रहा था जैसे आँगन में महकती रातरानी! माँ से जितना दुलार, ममता मिलती उससे ज्यादा तो उसे डांट पडती थी!
एक जगह उसकी माँ उसे कहती है.. "तीन दिन से एक फ़ोन तक नहीं किया... क्या बात है विनु? कहाँ उलझा है तूँ? कहीं कोई वहाँ की लड़की के चक्कर में तो नहीं भूल गया हमें?
तभी विनय की ये पंक्तियाँ वैदेही का ध्यान आकर्षित करती है और आँखों पर छाई महीन झिल्ली दूर हट जाती है।
"माँ! आपको विश्वास नहीं अपने बेटे पर? क्या मैं अपनी माँ, अपनी जन्मभूमि को भूल सकता हूँ? क्या मेरी बाल सखी 'मिली' को दिया वचन तोड़ दूंगा मैं? राम जी का भक्त हूँ न मैं! पहले तो किसी को वचन देता नहीं और दिया तो उस वचनपूर्ति के लिए जान लगा दूंगा माँ मैं!
माँ! देश मेरा पहला प्यार है.. बाकि सब उसके बाद!"
वैदेही ने खुद-ब-खुद अपने इर्दगिर्द खींची कल्पना की जंजीरे अब तड़ातड़ टूट-टूट कर बिखर रही थी! दोस्ती और प्रियतम के प्यार का फर्क वह समझ गई थी! अपनी मयूर पंखी भावनाओं का इंद्रधनुषी पंखा उसने झट से समेट लिया और वह स्मृतियों के जाल से बाहर आने की कोशिश करते-करते वह थक कर चूर हो गई और उसकी आँख लग गई।
अलार्म की घंटी बजते ही वह उठ खड़ी हुई और कॉलेज जाने के लिए तैयार होने लगी! माँ तो पहले ही उठकर चाय, नाश्ता बना चुकी थी! शंका-कुशंका के झूले पर उसका मन झूल रहा था।
आसमानी नीले रंग की ब्रांडेड जींस और काले रंग पर उभरे चटक रंगों से सजे फूल-पत्तों वाले टॉप में उसका रूप और भी निखर रहा था! नई स्टाइलिश पर्स उसके व्यक्तित्व को चार चाँद लगा रही थी और गहरे नीले स्पोर्ट्स शूज उसकी गरिमामय उपस्थिति को आकर्षक बना रहे थे! नाश्ता कर वह सही समय पर तैयार हो गई और वज्र की गाड़ी का हॉर्न सुन वह बंगले के बाहर चली आई...
वज्र का इशारा पाते ही गाड़ी चालक ने गाड़ी का दरवाजा खोला और वैदेही गाड़ी में बैठ गई.. माँ उसके हाथ हिलाने का इंतज़ार करती रही.. और दोनों निकल पड़े एक नये दौर का आगाज़ करने.. कॉलेज की ऒर...
गाड़ी से निकलते ही दोस्तों ने उनका तालियों से स्वागत किया और सब चल पड़े कक्षा की ऒर...
कॉलेज के सभी लेक्चरर, प्राध्यापकों ने उनकी भूरी-भूरी प्रशंशा की, उनकी जीवट, जद्दोजहद को नमन कर उन्हें भविष्य के लिए शुभकामनाएँ दी और उनके जीवन के एक स्वर्णिम अध्याय की शुरुआत हुई।
वैदेही ने सभी विषयों का अभ्यास दिल लगा कर किया.. उसे बीते दिनों की पढ़ाई को भी पूरा कर आगे बढ़ना था! वज्र को इतने समय बैठने को थोड़ी परेशानी हो रही थी लेकिन प्राध्यापक के सहयोग से उसने क्लास अटेंड किया... उसके लिए एक आरामदायक कुर्सी का इंतज़ाम किया गया था! शारिरीक परेशानी के बावजूद वज्र आज बहुत खुश था! इतने दिनों बाद अपने हमउम्र दोस्तों संग मिलना-जुलना, उनसे बतियाना, हँसना- हँसाना उसे भा रहा था मानों वह अपनी पुरानी दुनिया में लौट चूका था...वज्र की खुशी देख वैदेही बहुत उत्साहित हुई लेकिन उसकी पैनी नज़र से उसकी बेचैनी छूट नहीं पाई... उसने वज्र से जल्दी घर जाने की बात कही और दोनों घर की तरफ निकल पड़े।
सभी शुभचिंतकों की दुआएं, मंगलकामनाएं उनके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भर रही थी और वह हौले-हौले ज़िन्दगी की शतरंज पर श्वेत-श्यामल गोटियाँ बिछा कर वक़्त को चुनौती देने का हौसला जुटा रहें थे।
आबा आँगन में नीम के पेड़ तले इंतज़ार ही कर रहें थे... जिसे हम प्यार करते है, उसके जरा सा दूर जाते ही सैकड़ो आशंकाएँ मन में घर कर जाती हैं मानों खंडहर में लटकते जालों के बिच से झाँकती मकड़ियाँ...
वज्र को देख आबा की साँसे कुछ हद तक स्थिर हो गई.. उन्होंने वैदेही को भी अंदर बुलाया... और फ़ोन कर वैदेही की माँ को सन्देश दे दिया...
वैदेही ने वज्र को आराम करने की सलाह दी.. कुछ थकान ज्यादा ही दिखाई दे रही थी उसके चेहरे पर..
कुछ समय आँखें बंद कर वह आरामकुर्सी पर बैठ गया.. वैदेही भी ख़ामोशी से उसे निहार रही थी.. अन्नपूर्णा ने लाया मोसम्बी जूस पी कर दोनों कुछ तरोंताज़ा हो गए थे... वैदेही घर जाने के लिए उठ ही रही थी कि वज्र बोल पड़ा! "वैदेही! बस न थोड़ा वेळ...तुम पास होती हो तो दुनिया बड़ी रंगीन नज़र आती है... तुम्हारे जाते ही ऐसे लगता है मानों अमावस का अँधेरा मुझे निगल लेगा.. बैठ न यारा...कुछ देर.. प्लीज"
वैदेही क्या बोलती, क्या बहाना करती ? वह कुछ देर रुक गई..तभी वज्र बोल पड़ा.." वैदेही! एक बात पूछूँ? सच- सच बताओगी न.. मेरी कसम है तुम्हें!"
एक पल के लिए वैदेही डर गई.. आखिर क्या पूछना चाहता है यह? वैदेही विचारों में उलझ रही थी तभी वह बोल पड़ा, " विनय अब इस दुनिया में नहीं है न? उसका ही दिल धड़क रहा है न मुझ में? कॉलेज में रिया ने कहा मुझे! सच बोलो वैदेही.."
तभी आबा भी आ कर दरवाजे पर खड़े हो गए थे... वैदेही ने आबा की तरफ देखा.. वह बोल पड़े.."हो पोरा! खरं आहे हे... तुझी स्थिती बघून आम्ही हा निर्णय घेतला!"
बेटा! वह कोमा में चला गया था। उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं थी..मैंने उसके माता-पिता को विनती की थी... बहुत मुश्किल था उनके लिए यह निर्णय लेना..
तभी वज्र बोल पड़ा, "आबा! मुझे उसके माता-पिता से एक बार बात करनी है" वैदेही बोल पड़ी, " वज्र! आज रात को हम तीनों उनसे बात करेंगे.. यश को भी बुलाऊंगी यहाँ.. फिर हम सब उनसे बात करेंगे, उनका हालचाल पूछेंगे ... अब तुम विश्राम करों वज्र! प्लीज "
मायूसी के बादलों ने वज्र को घेर लिया था लेकिन वह भी असहाय था.. एक सच्चे मित्र को खोने का गम इतनी आसानी से कैसे भूल पाएंगे सभी दोस्त?
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!