भाग १८
वज्र की आँख लग गई थी और आबा खिड़की के उस पार से झाँक रहें पूनम के चाँद को देख मन ही मन मुस्कुरा रहें थे... जीवन की आपधापी में वह प्रकृति का आनन्द लेना ही शायद भूल चुके थे..छोटे से गाँव निकला यह किसान का बेटा अपनी मेहनत और ज़िद के बल पर फल-सब्जियों का एक सफल निर्यातक बनेगा यह एक दिवास्वप्न जैसा ही था!
आबा जानते थे, सफलता पाना आसान हैं लेकिन उसे दीर्घ समय तक बनाएं रखना, सफलता के शिखर पर निरन्तर बने रहना नामुमकिन नहीं मगर मुश्किल जरूर हैं! वज्र ने जब उच्च शिक्षा के लिए व्यापार का क्षेत्र चुना तो उन्हें बड़ी खुशी हुई.. वो चाहते थे वज्र आयात-निर्यात की बारीकियों को समझें, व्यापार को नई तकनीक से जोड़े तथा व्यवस्थापन में निपुणता प्राप्त कर अपने व्यापार को नई ऊँचाईयां प्रदान करें...
यह वह पीढ़ी थी जिसने अपने पुरखों में देश को विकास की राह पर आगे बढ़ाने का जज़्बा कूट-कूट कर भरा हुआ देखा था...धरती माँ को दिलोंजान से प्यार करने वाली यह पीढ़ी वसुंधरा की कराह को सुनते-सुनते ही बड़ी हुई थी
वो जानते थे पुराने ढर्रे पर चल कर खेती से दाल-रोटी का जुगाड़ भी नहीं हो सकता... कुछ न कुछ नया रास्ता खोजना ही होगा, नये उपक्रम करने होंगे।
बच्चों की इस दर्दनाक दुर्घटना ने उनके उम्मीदों के घरौंदे को तितर-बितर कर दिया था! उपवन में खिले रंगबिरंगी फूल वक़्त की एक ठोकर से धूल के फूल बन चुके थे। समय के आगे किसका जोर चलता है भला?
यह तो सिद्धि विनायक विघ्नहर्ता की कृपा थी कि अगम्य जीवट और जद्दोजहद के बाद पांच में से सिर्फ चार युवा अपनी ज़िन्दगी की नई पारी की शुरुआत करने में कामयाब हो गए थे...
अतीत की यादें आबा के मानस पटल पर दस्तक दे रही थी और आबा अनजाने में ही उनके स्वागत में पलक-पावड़े बिछा रहें थे..कितने सालों बाद आबा के घर में किलकारियां गुंजी थी, वह भी गणपतिपुले के दाहिने सूंड वाले स्वयंभू गजानन जी की कृपा से!
सारा गाँव बचपन में वज्र को 'नवसाचं पोर' कर के ही जानता था...आबा गाँव के पाटील होने के कारण सभी का उनके घर आना-जाना तो लगा ही रहता था। उनके घर-आँगन में मनाया जाने वाला त्यौहार ' बैल पोळा' और उनके घर की बनी 'पुरणपोली' पुरे गाँव में प्रसिद्ध थी! पूरा गाँव ही मानों आबा का परिवार था।
आबा अपने माता-पिता की एकलौती संतान थे जो इस दुनिया में मौजूद थी ....आबा की दो जुड़वा बहने थी लेकिन उनकी बचपन में ही असमय मृत्यु हो चुकी थी...
आबा विचारों के आवर्तों में और भटकते अगर छोटू उन्हें आवाज़ न देता... "आबा! लई रात झालीय.. गार वारं लागतयं... झोपा वाईच" छोटू की आवाज़ से आबा की 'यादों की महफ़िल' सिमट गई और आबा अपने कमरे की ऒर चले गएँ... छोटू ने पानी से भरा ताम्बे का लोटा आबा के कमरे में रख दिया। आबा के दिन की शुरुआत आज भी रात को साफ़ ताम्बे के लोटे में रक्खा पानी पीकर ही होती थी ...
सुबह वज्र को कॉलेज जाने की तैयारी करते देख आबा गैलरी में आरामकुर्सी में बैठ कर इत्मीनान से अख़बार पढ़ने लगे..
"आबा! येतो मी " कह कर वज्र निकल गया और आबा अपने दैनिक क्रिया-कलापों में व्यस्त हो गएँ...वज्र की चिंता की तलवार उनके दिलोंदिमाग पर अक्सर लटकती रहती थी... कितनी बार वैदेही ने उन्हें समझाया था," आबा! बाप्पा वर विश्वास आहे न तुमचा?" जब खुद से कोई उलझन न सुलझे...तो बाप्पा पर छोड़ कर निश्चिन्त हो जाओ न आबा! वो सबका रखवाला, तारणहारा, विघ्नहर्ता! करने दो न दीनानाथ को चिंता! आप क्यों उनके क्षेत्र में अतिक्रमण करते हो? और अगले ही पल दोनों खिलखिलाकर हँसते! 'गुणा ची पोर ग' कहकर आबा उसे दिल खोल कर दुआएं देते और अपने काम में लग जाते।
आज कक्षा में इकोनॉमिक्स के पिरीयड में सर बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बारे में पढ़ा रहे थे.. वज्र ने बिच में हाथ खड़ा किया और अपनी शंकाओं का समाधान करने के लिए विनती की! वैदेही उसके उत्साह और अभ्यासु वृत्ति को देख कर अचंभित थी! प्रोफेसर ने भी 'अति उत्तम प्रश्न' कह कर वज्र का उत्साहवर्धन किया और महत्वपूर्ण मुद्दे का पूरा विश्लेषण किया! सारी कक्षा उसकी जिज्ञासु वृत्ति की कायल हो गई।
वज्र ने अपना सबसे कठिन समय राजहंस की भांति ज्ञान के मोती चुगने में ही लगाया था... हॉस्पिटल में मोबाइल के उपयोग पर पाबन्दी थी तब उसने किताबों को अपना साथी बना दिया था! विचारों के धागे जब एक-दूजे में उलझ जाते हैं तो यह किताबें ही हैं जो हमें सही मार्गदर्शन करती हैं.. गुणीजनों के अनुभव की थाती हमारी साथी बनकर हमें मंजिल के दर्शन कराती हैं.... सभी विस्मित थे और आनंदित भी! विपदा में भी ज्ञान की सम्पदा का अर्जन कर, उसे सहेज कर रखने का हुनर कोई वज्र जैसे जिगरवाला विरला ही जानता है!
चारों जवांदिल युवा अतीत की स्मृतियों को पुरानी बड़ी संदूक में बंद कर, उस पर बेखौफ़ खड़े हो कर, वर्तमान की खिड़की से झाँक कर, नये आकाश को छूना चाहते थे.. क्षितिज रेखा के पार जा कर नए जहाँ की नींव रखना चाहते थे। वक़्त की गुस्ताखियों को अनदेखा कर वक़्त को ही अपनी अमीट जिजीविषा से चुनौती दे कर ठेंगा दिखाना चाहते थे। अब उनकी जंग रच्चनहारे से थी, सृष्टी के नियामक, नीति निर्धारक से थी।
चारों मित्रो ने विचार-विमर्श कर वार्षिक उत्सव में एक नाटक-प्रतियोगिता के लिए अपने नाम लिखवाएं थे...विभा और यश तो बहुत ही उत्साहित थे... निराशा के बादलों को वे अपने आसपास भटकने ही नहीं देते थे...यश पर तो यह गाना बिल्कुल सूट होता था..
" मैं ज़िन्दगी का जश्न मनाता चला गया,
हर फ़िक्र को धुएँ में उडाता चला गया "
और विभा को देख कर नाच-नाच कर गाने का मन करता था... " मैं चली, मैं चली, मैं हूं प्यार की कली,
मुझे रोके न कोई, मैं चली, मैं चली... ल लल्ला ल लल्ला "
अब इन जश्न बहादूर दीवानों को देख कर कौन बन्दा उन्हें रोकने की जुर्रत करेगा?
इस ग्रुप का निर्माण रच्चणहारें के आशीर्वाद से शायद बहुत सोच-समझ कर हुआ था! दो चंचल, शोख, निर्मल जल की धाराएं, दो समानांतर पाटों के बिच बह रही थी ...सम्यकत्व भाव से....अनवरत।
सभी ने शाम को वज्र के यहाँ मिलने का फैसला किया और सब चल पड़े अपने-अपने घोंसलों की ऒर....आकाश में नई उड़ान भरने का हौसला जुटाने..
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |
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