होले से दस्तक दे रही जिंदगी,
रात ने अंगड़ाई ली अभी-अभी!
दिल्लगी बन गई दिल की लगी,
चाँदनी मुस्कुराई है अभी-अभी!
दरख्तों की आड़ से झाँके माहताब,
रात की पलकों में कैद हैं ख़्वाब!
खुशनुमा बयार ने छेडा है साज,
बादलों ने किया जश्न का आगाज़।
चांदनी में नहाया है सारा जहाँ,
दीवानगी का आलम छाया यहाँ,
जिंदगी! चोट खा लौटा हूँ यहाँ,
वक़्त की लकीरों में समेटने जहाँ।
वक़्त! ठहर जा! जीने दे जिंदगी,
निशा की बाहों में सिमटी जिन्दगी।
धड़कनों का संगीत सुन लूं जरा,
वक़्त के प्रहार को भूल जी लूँ जरा।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।