भटकन!
पार्थ! सदा लक्ष्य को दृष्टि पथ में रखना,
स्वयं को भाव-लहर-भटकन से बचाना! 

प्रश्न-उत्तर के चक्रव्यूह से स्वयं उबरना,
धर्म-कर्म-कर्तव्य की डोर को संवारना!

सगे-सम्बन्धियों की पंक्तियों से अलिप्त,
स्वार्थ-अर्थ मोहपाशों में न रहना लिप्त!

धर्म-रक्षा हेतु आएं जब श्रीहरि धरा पर,
जीवन-मृत्यु-गणना गौण हैं रणभूमि पर!

महाबली, ज्ञानी रावण धर्म से हुआ विचलित 
शिवभक्त को मिला स्व-कुकर्म का फलित!

मृग-मरिचिका ने बढ़ाया अहंकारी का गुमान,
सतित्व की ज्वाला में स्वाहा हुआ दशानन!

कैकई के मानस पर छाई जब स्वार्थ की काई,
वीर माता भी बन गई स्व-पुत्र-उलाहना की खाई!

समय के यज्ञकुण्ड में कुंदन सा तपा हर सम्बन्ध,
अयोध्यावासियों ने सम्हाले चौदह वर्ष ऋण-बन्ध!

चेतन मन में धर्म, नैतिक मूल्यों का अद्ध:पतन, 
देख चकित हुए श्रीहरि, विदुर, दरबारी, वरिष्ठ जन!

अहंकार में मदमस्त गजराज सा दुर्योधन, दु:शासन,
ठुकरा कर श्रीहरि प्रस्ताव दे विनाश को आलिंगन!

विचारों-सिद्धांतों में भटकन, सर्वनाश को निमंत्रण,
धर्म रक्षा हेतु आवश्यक शक्ति-संतुलन, नियंत्रण!


स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |



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