शीर्षक : गरल
अरि-हन्ता खल-संहारक गरल साधन भारी !
युद्ध-क्षेत्र में मारक कूटनीतिक शस्त्र भारी!
साँपनाथ-नागनाथ से जग में मची त्राहि-त्राहि,
शान्त करने खल-क्षुधा विष-कीमया काम आई!
पर्यावरण-पर्यवेक्षक भारतीय संस्कृति-रक्षक!
वृक्ष को पिला गरल-जल स्वार्थी बना भक्षक!
अल्प-लाभ हेतु भूले निज अस्तित्व-अभ्युदय!
स्वर्ण-मुद्रा हेतु करें जमीन-जल-जंगल विक्रय!
मथ-मथ मठ्ठा मटकी में मिले मधुर माखन,
मथ-मथ महासागर मिले अनमोल रतन!
सुर-असुर अधीर मिल कर करें समुद्र-मन्थन !
प्रथम रतन कालकुट विष करे शिव प्राशन!
गिरिधर भक्ति में लीन मीरा भूली जग की रीत,
राणा की परिणीता मीरा जीत न पाई मनमीत!
परिजनों का उपहार जहरीला सर्प बना फूलमाला!
गरल युक्त सुवर्ण-पात्र बना स्पर्श से अमृत प्याला||
भक्ति-युक्ति-शक्ति-कूटनीति युक्त गरल गाथा!
इतिहास के पृष्ठ-पृष्ठ पर लिखी हैं असंख्य कथा!
आत्महत्या का साधन कहीं हत्या का अस्त्र-शस्त्र!
प्रदूषित राज-तंत्र कहीं कूटनीति का ब्रह्मास्त्र!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |