"क्या सब ठीक है?" – एक स्त्री का आत्मस्वर
मोनिका शर्मा
आज जब एक महफ़िल में शिरकत की,
तो वही पुराने प्रश्नों की बौछार हुई—
"क्या सब ठीक है?"
"पहले से भी कमजोर लग रही हो।"
मैं बस मुस्कुरा दी।
क्योंकि अंतर में तो सब ठीक है…
फिर दोबारा टटोला की ठीक है
या शायद ठीक नहीं है।
लेकिन क्या सच में तनहाई में भी सब ठीक हो सकता है? या स्त्री के लिए जन्मो जन्मो का अभ्यास किसी बैसाखी के सहारे ही
चलना जानता है?
अचानक मेरे भीतर कोई तूफ़ान जागा।
एक प्रश्न चिह्न खड़ा हो गया —
"क्या वाकई मैं ठीक हूँ?"
कहीं ऐसा तो नहीं कि
ज़िम्मेदारियों में इतना डूब गई हूँ,
कि खुद को सुनना ही बंद कर दिया है?
घर, रिश्तों और अपनों में
इतना घुल गई हूँ कि
अपने ही मन की आवाज़
अब कानों तक नहीं पहुँचती।
बीते वर्षों में इतना कुछ सहा,
कि शायद सारे एहसास
किसी गठरी में बाँधकर रख दिए।
अब सोचती हूँ,
उस गठरी को खोलूं,
एक-एक एहसास को निकालूं,
उन्हें सुंदरता से सजाकर
अपने अस्तित्व की अलमारी में
सजाकर रखूं — आदर सहित ,प्रेम सहित ,थोड़ी मुस्कुराहट के साथ ,थोड़े माधुर्य के साथ। कड़वे सच को अंतराल में कैद कर दूं और बसंत को सावन को हृदय के आंगन में मयूर बनकर नाचने की अनुमति दे दूं ।
महामारी की उन भीषण रातों में
मेरी आँखों की नमी पसीने में छुप जाती थी।
पलकों की सूजन से ज्यादा
मन की थकावट भारी थी।
उफ़ जब सारे कांटों से अपने आप को बचाती हुई बाहर निकाल कर थोड़े से मजबूत डग भरने शुरू करें ही थे ,तो फिर कांटों ने आकर घेर लिया ।एक बार फिर इम्तिहान के कटघरे में लाकर बिठा दिया। फिर जिम्मेदारियां ने ऐसे बंधन डाल दिए ऐसी बेड़ियां डाल दी की अब कदम सिर्फ जिम्मेदारियां के निर्वाह करने के लिए ही उठते हैं। साल दर साल बीतते गए और मैं खुद को भुलाती गई।
दुनिया जब बार-बार पूछती है —
"क्या सब ठीक है?"
तो ये सवाल कभी-कभी
मेरे आत्मविश्वास को भी हिला देता है।
पर अब इसे मैं
जगन्नाथ की कृपा समझूंगी ।
शायद ये ईश्वरीय संकेत है कि —
"अगर सब ठीक नहीं है,
तो अब उसे ठीक करने का समय आ गया है।"गांडीव तो अर्जुन को ही उठाना पड़ा था कृष्ण तो सिर्फ सारथी थे ।
क्या अब
अपने अंतर्मन के उस सिंह को जागृत करने का समय आ गया है,
जिसकी दहाड़
स्वतः ही इस प्रश्न को विराम दे दे —
"क्या सब ठीक है?"