धन का असली रूप..
दिनांक १८-१०-२०२५
विषय:धन‌का असली मोल संस्कार (धन त्रयोदशी)

असल धन तो बौधिक संपदा ,
  अगर वो मिल जाती है ।
उस धन का क्या कहना जी,
 सब को कब मिल पाती है।।

भौतिक धन की औकात नहीं,
   यदि मद  में इतराती है।
सहज दानी  दौलत मंदकी ,
  कद्र  खुद से हो जाती है।।

   देना माॅं शारदैय हमको,
     संयम चेता जीवन में।  
  दो स्वस्थता धन्वंतरि देव 
   रोग न रहना  तन मन में ।।

 नहीं कहता धन नहीं जरुरी, 
   साथ विवेक जरुर देना।
  आ जाएं अहंकार यदि तो, 
  प्रभु  प्रदत धन परत लेना।।

 आडम्बर फटके नहीं पास,
    श्री देवी वो  ज्ञान देना।
 बनी रहे धन की भी गरिमा 
   सहज  मानक मान देना।।

   श्री देवी  संग सुसरस्वती, 
   आओ तो मिल कर आना।
      रंग रंगोली  तोरण बांध,
      रखूं  सजाके  दरवाजा।।
    
                     

स्वरचित: अशोक दोशी
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