भाग ५३
वैदेही और मित्र-मण्डली की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। कल तक अंधेरों में गुमसुम प्रारब्ध की रेखाएं अब सौदामिनी सी चमक रही थी। वैदेही के वाकचातुर्य से सभी प्रभावित थे। प्रधानमंत्रीजी द्वारा उसका संज्ञान लिए जाना बहुत बड़ी उपलब्धि थी। मित्र-मण्डली के जीवन का यह अनूठा अवसर था। गर्व से सब के मस्तक उन्नत थे और सभी इस अद्भुत पल को अपने ह्रदय पटल पर अंकित कर चुके थे।
रात की फ्लाइट थी। दिल्ली में घूमने-फिरने-देखने के लिए ज्यादा वक़्त नहीं बचा था। सभी ने आराम करने का निर्णय लिया और गेस्ट हाउस के स्वागत कक्ष में विराजमान हो गएं।
बहुत समय से खामोश वज्र बोल पड़ा, " वैदेही! लख लख बधाइयाँ! तुम्हारी प्रतिभा का लोहा तुमने मनवा ही दिया! हमें गर्व हैं तुम पर!"
तभी यश बोल पड़ा, " यार! मज़ा आ गया! क्या हॉल था, क्या माहौल था! कितना गरिमामय व्यक्तित्व हैं प्रधानमंत्री जी का! कितनी दूरदर्शिता हैं उनकी सोच में! युवाओं की नब्ज़ कसकर पकड़ना आता हैं उन्हें! सीधी दिल में जगह बना ली उन्होंने हमेशा के लिए ! यार! ऐसा मौका कब मिलता हमें? सभी ने हमें टी वी पर देखा लाइव ...यार वैदेही! सेलिब्रेटी बन गएं हैं हम! थ्री चियर्स फॉर वैदेही! हिप...हिप... हुर्रये!"
वैदेही के मोबाइल ऑन करते ही मोबाइल की रिंग टोन सुनाई देने लगी...
" हर घड़ी बदल रही हैं धूप ज़िन्दगी.."
आबा बात कर रहे थे, " पोरी! जिंकल स ग पोरी...जिंकल स! "आज श्री की बहुत याद आई! कितना खुश होता वह तुम्हें मंच पर आत्मविश्वास से भाषण देते हुए देख कर! खूब खूब अभिनन्दन पोरी! डोळ्याचं पारण फेडलस ग माझ्या "
आबा भाव विभोर हो गए थे। शब्द कम पड रहे थे उन्हें अपनी खुशी व्यक्त करने के लिए! उन्होंने जानकी जी और वज्र से बात की और फ्लाइट के मुम्बई पहुँचते ही उन्हें लेने के लिए गाड़ी भेजने की बात कही। आबा सभी मित्र-मण्डली का अपने परिवार सा ध्यान रखते थे। उनके दिल में इतनी विशाल जगह थी कि सभी कि खुशियाँ, दर्द-पीड़ा उसमें समा जाती थी मानों अथाँग फैला नीला समंदर!
चायपान की व्यवस्था कैंपस के कैंटीन में ही की गई थी। विभा अन्तरमुख हो चुकी थी। यश से बिछड़ने के पल जैसे-जैसे नजदीक आ रहे थे वह चिंता में निशब्द हो रही थी! एक चहचहाते परिंदे की ख़ामोशी सबको चिंतित तथा स्तब्ध कर रही थी।
यश कैसे खामोश रहता? वह बोल पड़ा, " अरे मेरी ब्यूटी क्वीन... क्या बात हैं? अकेले-अकेले, चुपके-चुपके से मम्मी ने साथ दिया लड्डू मुँह में ठूंस दिया क्या? आवाज़ ही नहीं निकल रही मेरी झाँसी की रानी की! वैदेही ने एक मील का पत्थर पार कर दिया हैं...हमें उससे और आगे जाना हैं! अब सीधा बैडमिंटन कोर्ट में तम्बू गाड़ना हैं... अगला सम्मान समारोह हमारा होना चाहिए! क्या कहती हो ब्यूटी-फूल?"
सभी खिलखिला कर हँसने लगे। वक़्त बार-बार इस युवा ब्रिगेड की न जाने क्यों परीक्षा ले रहा था! एक चुनौती पार की नहीं कि दूसरी चुनौती सामने ला कर खड़ी कर देता था। शायद वह जानता था कि चुनौती भी उसे दी जाती हैं जिसमें चुनौती को चुनौती देने का दमखम हो!
वैदेही ने ऐसे भव्य सम्मान समारोह की न तो उम्मीद की थी न अपेक्षा! अपने सभी मित्रों के साथ, दूरदर्शन पर सीधे प्रसारण के साथ, सभी स्नेहिजनों तथा हितचिंतकों के सामने हुए इस अतुलनीय आयोजन से वह फूले न समा रही थी! अपने शहीद पिता की अदृश्य गरिमामय उपस्थिति में, माता तथा मित्र-मण्डली के सामने जनता-जनार्दन का इतना प्यार पाना उसके लिए बहुत बड़ा उपहार था, उपलब्धि थी। छोटी सी गिलहरी की कोशिश भी उसका नाम इतिहास के पन्नों पर सुवर्ण अक्षरों से अंकित करा सकता हैं यही सत्य शाश्वत सत्य था! एक अदना से प्रयास की बदलौत वैदेही आज उत्सव- मूर्ति बन गई थी।
जानकी जी ने सभी को धन्यवाद दिया मानों सभी ने उपस्थित रह कर उनकी खुशियों को चार चाँद लगा दिए थे। वज्र बोल पड़ा, " हमारे परिवार के शुभकार्य में हम नहीं आयेंगे तो कौन आएगा? हमारा फ़र्ज था! आप आशीर्वाद दीजिये कि ऐसे मौके बार-बार आएं " वज्र की बात का सभी ने तालियाँ बजा कर स्वागत किया और चल पड़े अपने-अपने गेस्ट हाउस की ऒर तरोंताज़ा हो कर कैंटीन में जाने के लिए!
वैदेही, विभा और जानकी जी ने कमरे में प्रवेश किया। मोगरे की खुशबू से पूरा कमरा सुरभित था। वैदेही और विभा फूलों का गजरा जो यश ने लाकर दिया था कार्यक्रम में समय पर पहुँचने की जल्दी में बालों में लगाना भूल गई थी। फूलों की फ़ितरत हैं खुशबू फैलाना, समय, जगह कोई भी क्यों न हो उससे क्या फर्क पड़ता हैं? शायद ऊपरवाला उन्हें कह रहा था, "आपकी हँसी, आपकी मुस्कुराहट ही आपके हस्ताक्षर हैं, इन्हें संभाल कर रखिएं!"
सभी ने हाथ-मुँह धो कर परिधान बदल दिए! रंगबिरंगी उत्सव के पारम्परिक परिधान और प्रसाधन का स्थान अब सूती, हल्के-फुल्के सुविधाजनक वस्त्रों ने ले लिया था! विभा ने आसमानी नीला टी शर्ट और गहरी नीली जींस पहन थी और वैदेही ने चन्दन कलर की चेक्स की शर्ट और राखाड़ी रंग की जींस! जानकी जी ने भी खादी की कत्थई रंग की आम्रपाली कुर्ती और दूधिया रंग की सलवार पहन ली थी! सभी ने पर्स वहीं रक्खी थी क्योंकि वक़्त की कमी थी और वापस लौट कर सामान को समेटना था। नौ बजे तक उन्हें भोजन कर 'इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट' पहुँचना था।
सभी गेस्ट हाउस के स्वागत कक्ष पहुँच चुकी थी। विभा ने यश को फोन कर कहा कि वो कैंटीन में पहुँच रही हैं। वज्र और यश कैंटीन के द्वार पर उनका इंतज़ार कर रहे थे। दो सौ मीटर के फासले पर ही कैंटीन था। सभी इस पुराने कैंपस की सुंदरता, विविधता का आनन्द लेते-लेते कैंटीन पहुँच गई।
सभी ने चाय के साथ खारी-बिस्किट का आनन्द लिया और कैंपस के बोटॅनिकल गार्डन का आनन्द लेने पहुँच गएं। ठण्डी हवाएं गालों को छूँ कर कानों में कुछ गुनगुना रही थी। हवा के साथ-साथ फूल-पत्तियाँ झूम-झूम कर जश्न मना रही थी। मोगरे के फूलों की खुशबू फव्वारे के पास रक्खे रंग-बिरंगी गमलों से आ रही थी! लाल, पीले, गुलाबी, सफेद गुलाब काँटों पर खड़े हो कर हमें झाँक-झाँक कर देख रहे थे। काटेकोरान्टी के नन्हें-नन्हें फूल टुकुर-टुकुर देख कर प्रश्नवाचक मुद्रा में सूरज की ऒर छोटी-छोटी आँखों से देख रहे थे मानों पूछ रहे हो, " सूर्यदेव! कौन हैं ये मेहमान? "
फव्वारे से उछल-उछल कर तन को स्पर्श कर सुकून पहुँचाते तुषार मानों नन्हें बच्चें से साथ चलने की ज़िद कर रहे थे! जानकी जी ने कलाई में बँधी घड़ी देखी। गोधूलि बेला हो चुकी थी। आसमान में सूरज पश्चिम की ऒर धीरे-धीरे बढ़ रहा था। अब वह पूरा आग का गोला बन चूका था। अँधेरों ने अपने क्षेत्र में अतिक्रमण होते देख सूरज को पूरा का पूरा निगल लिया था। गौमाता अपने घर, गौशाला की ऒर बढ़ रही थी! रास्ते में उड़ती धूल पहले तो ऊंचाइयों को छूने कोशिश कर रही थी और फिर मेंढक सी कूद लगा कर, असफल हो कर धरती की गोद में मुँह छुपा कर सोने का नाटक कर रही थी!
वक़्त कहाँ थमता हैं? वह तो अपनी रफ़्तार से बढ़ता ही रहता हैं। सभी गेस्ट हाउस की तरफ लौट रहे थे। भोजन की व्यवस्था हॉटेल के डिनर हॉल में ही थी। सभी ने सामान समेट कर पैक किया और फिर निकल पड़े भोजन करने!
जैसे-जैसे मित्र मंडली का अपने आशियाने की ऒर लौटने का वक़्त करीब आता जा रहा था वैसे-वैसे मन में खान-पान से संबधित विचार कम बल्कि कल की उहापोह और प्रस्तावित भविष्य की संकल्पना के विचार ज्यादा आने लगे थे।
खुशियों के पल कितने जल्दी-जल्दी पसार हो जाते हैं न? आसमान में बादलों के पीछे से झाँकते चाँद से! खुशियों को समेटते-समेटते जब हम थक जाते हैं तों चंद पलों में ही गहरी नींद में खो जाते हैं और पहुँच जाते हैं स्वप्ननगरी में...उर्वरा भूमि पर उम्मीदों के बीज बोने!
मित्र-मण्डली भी उसी राह पर अग्रेसर थी। भोजन के पश्चात् सभी अपना-अपना सामान लेने तथा पीछे कुछ छूट तो नहीं गया इसका संज्ञान लेने के इरादे से कमरे में चले गएं! कमरे का कोना-कोना छान मारा, चार्जर, मोबाइल को टटोला, बाथरूम वगैरा चेक कर सभी सामान स्वागत कक्ष में रख कर, हॉटेल के कर्मचारी को कमरे का कार्ड सौंप कर निकल पड़े गंतव्य की ऒर..
गेस्ट हाउस के बाहर 'ओला' उनका इंतज़ार कर रही थी। डिक्की में सामान भर सभी गाड़ी में बैठ गए। यश आगे की सीट पर बैठा था। बड़ी SUV होने की वजह से सभी आराम से बैठे थे। सबको अब मुम्बई पहुंचने की जल्दी थी। दिल्ली की सडकों पर गाड़ी दौड़ रही थी... यादों को पीछे छोड़ कर, एक नई मंजिल की तलाश में ....
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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