नव वर्ष की बेला... नववर्ष की बेला है, मौसम बड़ा अलबेला है,
घर-आँगन में खिले, चंपा-चमेली-बेला हैं!
महका सारा जहां, खुशियों का रेलम-पेला है,
वर्ष 2025 का शुरू हुआ सतरंगी खेला है!

धूप-छाँव, गम-खुशी का मधुरस-प्याला है!
आंखों के पैमानों में, सपनों की हाला है!
दीवानगी का आलम न पूछो हाल निराला है!
कहकहों में आँसू, जीवन-अनुभव शाला है!

सजती रहें महफिलें, रोशन हो सारा जहाँ!
जुगलबंदी के ताल पर, डोलती रहे लौ यहाँ।
शब्द में ब्रह्माण्ड हो, ब्रह्म में आनंद-नाद!
जीवन के आदि-अंत का पवित्र शंख नाद।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र।
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