खेल-खेल में क्यों, खेला कर बैठे।
दीदी! घर तेरे, मेहमान क्यों ऐठे।।
बुला लिया सबको, मजे करो, आओ!
मूल्य चूका बन्दे, लाठी भी खाओ।।
मुँह में उंगली है, अतिथि मेसी के।
स्वागत में टुकड़े, बोतल-कुर्सी के ।।
गया चरमरा क्यों, आयोजन सारा।
बंग-शेरनी का, गुस्सा क्यों हारा।।
औरों के आगे, शगुफा माफ़ी था।
इज्जत फालूदा, क्या यह काफ़ी था।।
छवि कैसी होगी, खेल खिलाडी की।
दुनिया में कैसे, साख बचे सब की
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।