विषय:सजगता
सजग रहें हमेशा
हम हो या आप, या और कोई, सजगता
बहुत जरूरी ।
सतर्क रहें,सचेत रहें,
रहे समर्पित,
संवेदी, बिन उसके तो मानों
जिंदगी अधूरी ।
अगर प्राप्त
करनी हो
सफलता हमें,और करने हो
सिद्ध लक्ष्य,
व्यवहारिकता से पाने हो मुकाम,
तो तराशे खुद को।
उद्घाटित करनी हो
तकदीर रहें सतत सजग,ये तकाजा
है जमाने का,
वर्ना घेरेगा
मन अवसाद
कमज़ोर न हो तन ।
रखें सजग
अपनी चेतना को,
करें ध्यान चिंतन मनन
होकर अन्तर्ध्यान
जानें जीवन की
बारीकियां,
मिलेगा संतोष।
कैसे बोलना, कैसे बैठना,
कितना बोलना
कहाॅं, कब बोलना,
कैसे रहना,
कितना कहना, कितना सहना।
कैसे व कितना खाना,
कब तक कमाना,
कब सेवा निवृत होना,
काम कारोबार से
समझे यदि कोई कारोबारी हैं ।
वाणी पे
संयम रखना यह भी,
सजगता
का हिस्सा है ।
क्या पहनना, कैसे चलना,
इन सभी बातों का
यूं देखा जाए तो
बहुत महत्व है,और ये
महत्वपूर्ण
बातें ही जीवन की धूरी है ।
सजगता के साथ
समझदार बनना,
सकारात्मक, संरचनात्मक कहो
कि क्रियात्मक बनना ,
ये बातें ही हमें
भिन्न करती सृष्टि के,
अन्य प्राण व प्राणियों से।
भावना, संवेदना,
मनुष्य को देती पहचान
और इस पर
निर्भर बातें सारी।
न हो सजगता
तो फिर फर्क ही क्या रहेगा,
जंगली,
पशुओं व वन मानुष
नरभक्षियों में।
सजग रहना पड़ता
हर व्यापारी,
मजदूर,चिकित्सक, शल्यचिकित्सक को,
सजग रहना पड़ता है,
सीमा के प्रहरी सैनिकों को,
वर्ना बन
जाती लाचारी ।
सजग रहना
चाहिए शासक प्रशासक को ,
सजग रहना
पड़ता तकनीशियन को ,
जरा सी भी
लापरवाही
पड़ जाती भारी ।
अरे यहाॅं तक
कवि कवयित्रियों,
शिक्षक, प्राध्यापकों
साहित्यकारों व हर
सृजनकार को।
सजग रहना
पड़ता है हर जन को
माॅं बापो को भी रहना चाहिए सजग,
घर परिवार को यदि
बनाना हो मनोहारी।
सजग रहना
पड़ता है संतों को,
उनसे बनते बिगड़ते परिवार समाज,
उनके बलबूते
पर देश और ये
दुनियां दारी है ।
सजग रहें सदैव विद्यार्थी,
यदि भटक गये,
अपनी राहें तो,
बड़ा मुश्किल, खत्म हो जाती
कारकिर्द
चाहे क्यों न वो
आम नागरिक ,
चाहे देश विदेश का,
उसमें नर रहे
चाहें वो नारी ।।
सजग रहें हमेशा
हम हो या आप, या और कोई, सजगता
बहुत जरूरी ।
स्वरचित: अशोक दोशी