मुद्दतो से तरस रही हूँ …
दो मीठे लब्ज सुनने को!
'बेटा! बोल'
न फोन न कोई चिट्ठी!
न वह सिर पर हाथ फेरना …
न वह संक्रांति के 'तिळ गुळ'
न वह 'साबूदाने सी दवाईयां'
न वह कड़वी-कड़वी डांट
न वह अनुशासन का पाठ ....
आखिर किस दुनिया में हो 'बाप्पा'?
क्यों तरसे बगियाँ के फूल आशीष के लिए?
क्यों छोड़ चल दिए अकेले मंझधार में ?
क्या भूल हुई चले रूठ अजनबी, अनजान जहाँ में?
क्यों दुआएं पहुँच पाती नहीं भूल-भुलैय्या से जहाँ में?
कैसे सफ़र पे निकल पड़े हो 'बाप्पा'
अपनों को पीछे छोड़ जहाँ में?
हथेलियों से पानी,
अर्ध्य डूबते सूरज को ....
आँगन में बिखरे सुमन सी
यादें सजी अंजुरी में!
'कुसुम ' भावांजलि...
ईश रूप पिता के चरणो में!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम सुराणा, मुम्बई।