नमन माँ शारदे🙏🙏
दोहा छंद!
शब्द : अभ्यास!
रखो निरंतर भावना, करों सतत अभ्यास।
दृढ़ मन की यह चाहना, देती अनुपम न्यास।।
अविचल हो मन लक्ष्य में, पूरी होगी आस। श्रमजीवी जो मानवी, करता आत्म विकास।।
प्रदत शब्द:-अंधभक्ति
अंधभक्ति में लीन हो, करते ऐसे काम।
ज्ञान तर्क के सामने, होता है बदनाम।।
दम्भी बाबा की बड़ी, फौज खड़ी बन बाज।
पग-पग ठगते जा रहें, भोले भावुक आज।।
गिद्ध बने फिरते सभी, करते दुष्कर काज।
दुखियारे मन की नमी, धरा उर्वरा राज।।
मत तोड़ो जन भावना, बड़ा लगे आघात।
तर्क शून्य हो मानते, ढाक चार हैं पात।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।