गुरु (मनहरण घनाक्षरी)...
अहोभाग्य गुरु मिले,
अंतस प्रसून खिले,
ज्ञान सुधारस पी लें,
लाभ शुभ लीजिए।

निराकार ज्ञानी बड़े,
काटे अहंकार जडें,
कुशल मंगल गढ़े,
मीठी वाणी सीखिए।

ज्ञान की सरिता बहे,
द्वेष-क्रोध-रिपु ढहे
आत्म ज्ञान पायें नित,
सुधा रस पीजिए।

गुरु ब्रह्म ज्ञान धनी।
खल हंता नाग फनी,
आत्म विकार दहनी,
मन शुद्ध कीजिए।

गुरु आदि मात-पिता,
जन्म लक्ष्य बिन बीता,
काष्ठ आकार प्रदाता,
गुरु मान दीजिए।

देश हित हम लड़े,
देव गुरु साथ खड़े,
गुरु कर जोड़ बढ़े,
आशीष स्वीकारिए।

देश सदा सर्वोपरि,
गुरु कृपा मिले हरि
वाल्या का बने वाल्मिकी,
आशीर्वाद पायिए।

रामदास समर्पित,
प्रण शिवबा वांछित,
राज्य हिन्दवी स्थापित,
गुरु ऐसा चाहिए।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।



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