ये प्यार ही तो ज़िन्दगी.... भाग ३३
भाग ३३

रात गहरा गई थी! इक्का-दुक्का तारा भी छुपा-छुपी खेल रहा था! वैदेही पानी की बोतल भर कर लाना भूल गई थी। आधी रात नींद खुली..आज न जानें क्यों उसका गला बार-बार सूख रहा था। वह रसोईघर की ऒर बड़ी.. तभी उसकी नज़र माँ के कमरे की तरफ गई! 
माँ को आराम कुर्सी पर ही किताब पढ़ते-पढ़ते नींद आ गई थी। वैदेही ने हौले से किताब उठा कर पास के टेबल पर रक्खी और उसमें से गिरे मयूरपँख को किताब के पन्नों के बीच में रख कर वह पानी लेने रसोईघर में गई। पानी पीकर वह अपने कमरे की ऒर चली गई। उसने खिड़की से झांका। अमावस्या की अँधेरी रात थी और झींगूर भी घुईं-घुईं करते-करते थक चुके थे! आँगन के सहजन की फलियाँ पवन के संगीत पर नृत्य कर रही थी।लेकिन उनका शोर बिल्कुल नहीं के बराबर ही था! रात ने काली चंद्रकला पहनी थी लेकिन न तो पल्लू पर सितारों की नक्काशी थी न ही साड़ी की जरतारी किनारी। 
वैदेही अक्सर माँ को रात-रात भर जागते हुए देखती मगर क्या करती? न तो उसके पास कोई समाधान था जानकी जी की तन्हाईयों का न जानकी जी ने कभी उसे ढूंढने की कोशिश की। अब तो अंधेरों से ही उन्हें प्यार हो चूका था! वैदेही ही उनकी मन की देहरी पर रक्खा उम्मीदों का दीया थी .. उनकी तन्हा, एकाकी ज़िन्दगी का सहारा! 

वैदेही मन ही मन गायत्री मंत्र बोल कर सोने की कोशिश करने लगी! नींद के भी अजीब नखरें होते हैं! कभी-कभी जमीन पर बिछी चटाई पर सो रहें मजदूर से भी मुस्कुरा कर लिपट जाती हैं और कभी-कभी लाख मन्नतें करने के बाद रेशमी सेज़ पर सो रहें करोड़पति को भी अंगूठा दिखा कर रफूचक्कर हो जाती हैं! 

आज पहला लेक्चर ही अय्यर सर का था! वज्र और वैदेही के वे चहेते प्रोफेसर थे। इकोनॉमिक्स जैसा क्लिष्ट और नीरस विषय भी वो इतने अच्छे से पढ़ाते थे कि विद्यार्थी ध्यान केंद्रित कर उसे बड़े चाव से पढ़ने लगता था! पढ़ाना भी एक अद्भुत कला हैं! उलझें हुएँ अनगिनत धागों जैसे जटिल मुद्दों को कोमलता से, एक-एक रेशे को अलग कर सुलझाना और फिर सरल भाषा में समझाना उनके जैसे विषय की गहरी समझ रखने वाले प्रोफ़ेसर का ही काम था! कक्षा में विद्यार्थियों की सर्वाधिक उपस्थिति उन्हीं के लेक्चर में होती थी! वज्र और वैदेही सही समय पर कॉलेज पहुँच चुके थे! 
माँ का बुखार नार्मल पर आ चूका था इसलिए वैदेही थोड़ी तनाव-रहित थी! वो चाहती थी माँ को थोड़ा आराम देना! आखिर कब तक... माँ अकेली जीवन का खटारा गाड़ा खींचती रहेगी... दर्द को जज़्ब कर जीती रहेगी?

सही वक़्त पर अय्यर सर ने कक्षा में प्रवेश किया और सभी नोट बुक तथा पेन निकाल कर बैठ गएँ। आज वह आयात-निर्यात के बारे में समझा रहें थे! एक ही पीरिएड में उन्होंने सभी महत्वपूर्ण बारीकियों पर प्रकाश डाला था! 
तीसरा पीरियड ऑफ होने की वजह से दोनों जल्दी घर लौट चुके थे! गाड़ी में वज्र ने वैदेही को आबा से बात करने का भरोसा दिया और उसे घर के बाहर छोड़ कर वह आगे बढ़ गया!

विभा गुलमोहर के पेड़ तले बैठी-बैठी सब का इंतज़ार कर रही थी! वह चिंतामग्न थी कि आखिर आज कोई आया क्यों नहीं! अब तक तो कम से कम वज्र, वैदेही को तो आ जाना चाहिए था! उसने वज्र को फोन लगाया! 
वज्र ने ऑफ पीरियड की बात बताई और दोनों के घर पहुँच जाने की बात भी कहीं! विभा समझ गई कि उन्होंने सोचा लेक्चर में डिस्टर्ब न करें.. और मेसेज कर दिया था लेकिन विभा ने मोबाइल चेक ही नहीं किया था! यश के कहने पर वह बैडमिंटन की रैकेट साथ लेकर आई थी और सुबह से साथ लेकर घूम रही थी! कक्षा के कितने सहपाठियों ने तो उसे पूछ लिया था, " विभा! आज कोई टूर्नामेंट हैं क्या? " और जबाब देते-देते वह थक गई थी। कब से अकेली बैठी-बैठी वह पक गई थी तभी सामने से यश को आते देख उसने सारा गुस्सा उस पर निकाल दिया।
" मोटू! जरा फ़ास्ट तो आ! क्या गर्भवती स्त्री सा ठुमक-ठुमक कर चल रहा हैं? कब से राह देख रही हूं.. "
सॉरी.. यार.. तहेदिल से सॉरी! मुझे क्या मालून तुम अकेली बैठी हो! अच्छा हुआ गुलमोहर के नीचे बैठी हो... उस पीपल तले बैठी होती तो अब तक तो सब भूत.. भूत कह कर भाग गएँ होते ... " वह आगे कुछ बोलता उसके पहले ही विभा ने रैकेट उठाई उसकी तरफ...और यश जोर-जोर से हँसने लगा! 

"विभा! कैंटीन चलते हैं पहले... पेट में चूहें दौड़ रहें हो तो दिमाग़ काम नहीं करता यार! " और उसने विभा की रैकेट भी खुद के हाथ में ली और दोनों कैंटीन की ऒर बढ़ने लगे...
विभा को यश का साथ बहुत मनभावन लगता था। जब भी यश उसके साथ होता वह अजीब सी ऊर्जा से भर जाती! दुनिया मुट्ठी में करने का सपना हिलोरें मारने लगता! यश का साथ एक तरफ जहाँ कवच-कुण्डल सा महसूस होता वहीं दूसरी तरफ दुनिया को चुनौती देने का हौसला देता! 
वह अपलक उसे निहार रही थी। उसका शरारती मन उसे छेड़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था! वह बोल पड़ी, " इतने दिनों बाद बैडमिंटन कोर्ट पर आमने-सामने होंगे.. ओपनिंग सर्विस पर दमदार शॉट चाहिए न.. फिर ये क्या यार! रुखा-सूखा.. सिर्फ चाय-बिस्कुट? 
"मैं तो मंगवा दूंगा रोस्टेड टोस्ट-सैंडवीच, पिज्जा... अभी तुम्हारी हाथी की चाल हैं... फिर तो..."दोनों खिलखिला कर हँसने लगे और दोनों ने एक-दूजे से मुट्ठी टकरा कर चिअर्स किया और फटाफट निकल पड़े कोर्ट की ऒर...बहुत दिनों बाद उन्हें देखकर जूनियर खिलाडी भी दौड़ कर उन्हें शुभेच्छा देने आएं। यश ने उन्हें भी साथ में खेलने के लिए कहा!

कॉलेज में बैडमिंटन का कोर्ट सालों पहले ही बना हुआ था और सभी विश्वस्तरीय सुविधाओं से लैस था! कोचिंग के लिए कॉलेज के पूर्व नामी-गिरामी राष्ट्रीय स्तर के खिलाडियों की सेवाएं भी उपलब्ध थी! यहाँ साल में कई बार राष्ट्रीय स्तर की स्पर्धाओं का आयोजन होता था। 

थोड़ा वार्म-अप होने के बाद चारों मिक्स डबल्स खेलने लगे! एक तरफ विभा और यश और दूसरी तरफ दोनों जूनियर्स! आसान नहीं था यश के लिए 'जयपुर फुट' के साथ खेलना लेकिन उसका जिगरा था न ... वह उसे चैन से बैठने नहीं दे रहा था! विभा ने हालात को समझ लिया और यश को नेट के पास खेलने को कहा और पीछे वह खेलने लगी! यश नेट पर खेलने में माहिर था! सामने वाले प्रतिद्वंदी का रिटर्न आते ही वह ऐसा नजदीकी शॉट लगाता कि सामनेवाले को सँभलने का मौका ही नहीं मिलता!

खेल के इन दीवानों को न समय की सुधबुध थी न अपनी शारीरिक क्षमता की...दोनों एक बार कोर्ट पर उतर गएँ कि सब कुछ भूल कर सिर्फ मैच जितने का जज़्बा ही याद रखते! एक शॉट को रिटर्न करने के चक्कर में यश पीछे की ऒर भागा और लड़खड़ाया! लेकिन विभा सचेत थी.. उसने झट से उसे संभाला और यश गिरते-गिरते बच गया! 
विभा ने उसे जादू की झप्पी दी और मैच जीतकर ही दोनों रुके! 
प्रतिद्वन्दी के रूप में खेल रहें नए खिलाडी उनकी जिजीविषा, जीवट, जज़्बा देख अभिभूत थे! संघर्ष का दूसरा नाम है खेल! चारों ने एक-दूसरे का अभिनन्दन किया और एक-दूसरे को शुभेच्छा दी। 

विभा ने यश की पीठ थपथपाई और कॉक उठाने झुकी तो उसने देखा यश के पैर से खून निकल रहा था! वह घबरा गई और यश की ऒर देखने लगी। यश स्थितप्रज्ञ मुनि सा निश्चल खड़ा था।
'जयपुर फूट' लगा कर खून निकलना यश को सामान्य पसीना निकलने जैसी घटना ही प्रतीत हो रही थी। उसने वैदेही की तरफ देखा और उसकी भीगी पलकों को पोंछते हुए बोला, " मेरी झाँसी की रानी! इतना सा खून देख कर डर गई? यह तो शुरुआत हैं! इतनी सी मुश्किल में हिम्मत हार जायेंगे तो कैसे प्राप्त होगा लक्ष्य? 
विभा तुम मेरी शक्ति हो...हिम्मत हो... तुम्हारा साथ ही तो मेरी उड़ान के अग्निपँख हैं! तुम्हारी चमकती आँखें ही तो मुझें नई-नई चुनौतियों को चुनौती देने को प्रेरित करती हैं... तुम कमजोर हो जाओगी...मन में पल रहें सपने की नींव ढुलमूल होगी तो सपनों के विशाल महल कैसे खड़े होंगे? विभा! स्त्री जब माँ आदिशक्ति का रूप धारण कर सहारा बन जाती हैं न, कोई भी शक्ति पौरुषत्व को ललकार नहीं सकती, पराजित नहीं कर सकती! तुम मेरी ताकत बनोगी न विभा? विभा यश से लिपट गई! उसकी ख़ामोशी ही उसका जबाब था! यह दो ज़िस्म का मिलन नहीं बल्कि दो सपनों का एकरूप हो जाना था!

आज कई दिनों बाद दोनों ने शिव मन्दिर में जा कर भोलेबाबा की पूजा-अर्चना की। अपनी पवित्र भावनाओं के अमृत-घट उंडेल कर भोलेनाथ का अभिषेक किया और स्वयं को उनके सामने समर्पित कर नतमस्तक हो गएँ ....

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में...


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