इंतजार

 

" दद्दा, किसका इंतजार कर रहे हो आप?" बगीचे में बेठे रामदयाल जी से मैं ने पुछा,
" बहुत दिनों बाद आये हो पार्क में?"
" सब कुशल मंगल?"
" बडे भैया आये थे ना आपको लिवाने?"
" बेटा.. उसी का इंतजार कर रहा हूं। कह गया, बाजार होकर आता हूं। पता नहीं,अब तक कहां रह गया।"
" हो सकता है, कोई दोस्त मिल गया हो।" रामदयाल जी ने चिंता करते हुए कहा।
" चलो दद्दा हमारे घर चलो।"
बचपन में उनके साथ खूब खेला हूं। पडोस वाली गली में रहते है। पार्क में हम बच्चों के साथ वे भी खेलते थे। आजकल कम मिलते है, कुछ बुढापे की ना नुकुर से, कभी तेज धूप, कभी बारिश के डर से। अकेले ही रहते है वे। लाडला बेटा विदेश में बस गया है।
घर आये मेरे साथ। थरथराते हाथों में चाय का कप ले फफक पडे। 
" माँ जी, बडी भाग्यवान हो आप जो ऐसा विवेकी, विनयी बेटा है आपका।"
चाय और नाश्ता कर वे वही सोफे पर सो गये। मैं भी सुबह की की सैर करने निकला। जब मैं उनके घर से गुजरा, देखा किसी का सामान उनके घर में रखा जा रहा है।
पता चला, बेटे ने घर बेच दिया है।
दद्दा को बेघर कर विदेश चला गया है, झूठी आस देकर।

स्वरचित  मौलिक  लघुकथा
चंचल जैन
मुंबई,  महाराष्ट्र

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