परिभाषा

शीर्षक : परिभाषा!

 

आईने के सामने खड़ा होकर टाई को सलीके से बांधते यश को देखकर दादी बोल पड़ी, " बेटा! आज मंगलवार है..मेरे साथ सिद्धिविनायक के दर्शन कर चले जाना ऑफिस!"

यश मुस्कुरातें हुए बोल पड़ा, " दादी! आप ही गजानन के मुषक के कान में मेरे प्रमोशन की बात डाल देना! आपकी बात टाल ही नहीं सकते वो.. कट्टर भक्त हो न आप उनकी.. मैं तो चला.. वरना लेट मार्क लग जाएगा !" यश फुर्ती से बाहर निकल पड़ा!

दादी मन ही मन मुस्कुराई! ए आजकल के बच्चे! धर्म-कर्म तो कुछ समझते ही नहीं..संस्कार नाम की भी कोई चीज होती है न... बडबड़ाते हुए वह चल पड़ी! 

सोसायटी में नीचे लगे बाकड़े पर बैठी मालती को रोते देख वह ठिठक गई! पारिजात सी सदा खिलखिलाती मालती के आँखों से मोतियों से झरते आँसू! सिर पर हाथ फेरते हुए वह पुछ बैठी, "क्या हुआ मालती?" दादी का स्पर्श होते ही वह फूट-फूट कर रोने लगी.. दीदी! आज यश नहीं होता तो तेरे बहनोई बच नहीं पाते! वहीं उन्हें हॉस्पिटल ले गया और समय पर उन्हें ICU में इलाज मिल गया... वरना ब्रेन स्ट्रोक में.... मालती को गले लगा कर दादी नें उसे सांत्वना दी.. यह तो धर्म था, कर्त्तव्य था यश का! मैं आती हूं अभी सिद्धि विनायक जी का प्रसाद लेकर.. उनसे विनती कर! वहीं तो हैं सब का रखवाला..

दादी की आँखें गर्व से चमक रहीं थी..सीना फूल गया था! वह समझ गई थी नई पीढ़ी की धर्म की परिभाषा!

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!

 

इस पर लोग क्या कह रहे हैं