ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ७१
भाग ७१

यशवंत राव जी कराड के लोगों का स्नेह देख कर फूले न समाएं। उनके खानदान की ज़िन्दगी भर की मेहनत रंग ला चुकी थी। उनका हौसला अब सिर्फ क्षितिज रेखा ही नहीं छूँ रहा था बल्कि अंतरिक्ष की सीमाओं को लाँघ नए-नए प्रतिमान गड़ रहा था। लोगों का उनपर बिनाशर्त प्यार और विश्वास देख कर वह कुछ समय के लिए भावुक हो गए लेकिन अगले ही पल उन्होने खुद को समझाया, यह वक़्त भाव-विभोर होने का नहीं बल्कि कर्मठता दिखाने का है। जिस अभियान की धुरी उन्होने अपने कंधो पर पेली थी उसे पूर्णत्व प्रदान किए बिना वह चैन से नहीं बैठेंगे। शुभकार्य में देरी क्यों? उन्होंने सभी मान्यवरों को भोजन पर बुलाया तथा काम के शुभारम्भ का आगाज़ किया।

नींव की खुदाई आज ही शुरू कर दी गई। वास्तुशास्त्रज्ञ तथा ईमारत के ठेकेदार भी वहीं उपस्थित थे। श्रीफल को पत्थर पर तोड़ कर खुदाई की रेखांएं खींची गई और काम शुरू हो गया। विघ्नहर्ता की कृपा-दृष्टी उन पर पहले से ही थी। एक तरफ नींव की खुदाई शुरु हुई तो दूसरी तरफ नलकूप की।

अप्पा ने सब का आभार व्यक्त किया और भोजन का आनन्द लेते-लेते सभी से वार्तालाप भी करने लगे। वो एक पल व्यर्थ गँवाना नहीं चाहते थे। काम के प्रति उनकी लगन और निष्ठा देख सभी अचंभित थे। उम्र उसमे कतई रोड़ा नहीं थी। उन्होंने सभी से सुझाव मांगे। कहाँ और किस तरह से कार्य होगा इसका भी ब्यौरा उन्होंने सबको दिया। सभी ने अपने सुझाव दिए। बोलियों के पैसे जमा करने के लिए हॉस्पिटल के नाम से एक खाता भारतीय स्टेट बैंक, कराड में खोल दिया गया था। उन्होंने सबको अपना योगदान इसी खाते में जमा करने को कहा था और 
इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी मित्र-मण्डली को दे दी थी। उन्ही के प्रयासों से इतना पैसा जमा हो गया था कि किसी भी हालत में पैसे की कमी इस अभियान को कमजोर नहीं कर सकती थी। 

उन्हें युवा कंधों पर पूरा विश्वास था खास कर पैसे के मामले में महिलाओं पर। महिलाओं कों सौपी गई जिम्मेदारी पूरी करने में वो एड़ी-चोटी का जोर लगा देती हैं यह वह जानते थे। डॉक्टर्स से चर्चा कर उन्होंने उनकी जरूरतों को समझा और उस हिसाब से आगे बढ़ने का मार्ग निर्धारित किया। उनका एक ही कहना था कि किसी भी हालत में आसपास के लोगों को इलाज के लिए शहर न जाना पड़े। उन्होंने हफ्ते भर बाद फिर डॉक्टर्स से मीटिंग निश्चित की और सब के विचार जानने लगे। सभी का यहीं कहना था कि यह ऐसा अस्पताल बने जिसमें नए युग तकनीक उपलब्ध हो, नई मशीने हाजिर हो  और सब से महत्वपूर्ण उन्हें इस्तेमाल करने के लिए उच्च स्तरीय प्रशिक्षण प्राप्त चिकित्सक, नर्सेस, मदतनिस, पैथोलॉजिस्ट हो ताकि उन सुविधाओं का सही उपयोग हो सकें। अप्पा अस्पताल में एक मंजिल ऐसी बनान चाहते थे जहाँ गरीबों का इलाज हो और एक मंजिल विदेशी लोगों के लिए जो ऊँची कीमत देकर स्वास्थ्य सेवाएं खरीदने का दमखम रखते हो। बाकी सभी के लिए वाजिब दाम में सभी सेवाएं दी जाये ताकि लोग स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने से पहले तनाव और अवसाद का शिकार न हो।

आज भी भारतीय समाज में दान-दाताओं की कमी नहीं हैं, जरुरत हैं उन्हें विश्वास में लेने की कि उनका पैसा सही जगह खर्च होगा। इतने दिनों की दौड़-धूप से अप्पा और उनका परिवार थक चूका था। वो भी दोपहर को आराम करने चले गएं। बाकी हॉटेल की लॉबी में गप्पे लगा रहे थे तो कोई हॉटेल के वातानुकूलित कमरे का लाभ उठाकर तरोंताज़ा होना चाहते थे। 

कार्यक्रम बहुत ही गरिमामय ढंग से सम्पन्न हुआ था इसीलिए सभी बहुत आनंदित थे। शाम को सभी कृष्णा- कोयना प्रीती संगम स्थल पर जाकर वहाँ मंदिरों की परिक्रमा करने वाले थे और संगम के शीतल जल को स्पर्श कर कृष्णा माई का आशीर्वाद लेने वाले थे। 

दो घण्टे आराम कर तरोंताज़ा होने के बाद सभी ने चाय-नाश्ता किया और चल पड़े घाट की तरफ! जाते-जाते उन्होंने शहीद स्मारक के आगे मत्था टेका और माँ भारती के लाल की कुर्बानी को याद किया और चल पड़े कृष्णा-कोयना का संगम देखने। कराड आकार कृष्णा माई शांत, धीर-गंभीर हो जाती हैं बिल्कुल एक अनुभवी गृहिणी की तरह। कोयना के गले मिलने के बाद भी वह सम्यकत्व को अंगीकार कर न ज्यादा उत्साहित होती हैं न ज्यादा उल्हासित मानों हर स्थिति को सम भाव से देखने का अमूल्य पाठ पढ़ा रही हो। 

काले पत्थरों से बना यह घाट अपने पुराने वैभव की यादें ताज़ा कर देता हैं। पुराने बरगद, पीपल, नीम के वृक्ष तपती धूप में भी पथिक को शीतलता प्रदान करते हैं। एक तरफ कृष्णा माई का प्यार-दुलार तो दूसरी तरफ माँ कोयना का उत्साह! सभी कुछ पथिक को मन्त्रमुग्ध कर देता था।  
श्री कृष्णामाई का घाट पर स्थित मन्दिर सभी को सुकून और शान्ति देता हैं। यह ग्रामदेवता हैं जो इस क्षेत्र की रक्षा करती हैं। मन्दिर की सीढ़ियों पर बैठ कर प्रीती संगम के नजारों को देखना, अस्ताचल को जाते सूर्य को अर्ध्य देना अपने-आप में अनूठा अनुभव था। 

विभा के मन में यादों के परिंदे स्वच्छन्द उड़ने को बेताब थे। बचपन में नदी किनारे खेलना-कूदना, माँ के साथ नदी में कपडे धोने जाना और खुद को पानी में पूरा भिगोना, अपने सखा-सहेलियों पर पानी उछालना और अस्ताचल को निकले सूर्य को अर्ध्य देकर गौमाता के गले की घंटियों के ताल में ताल मिला कर चलते-चलते घर की ऒर लौटना कैसे भूल सकती थी वह? 

इस नगरी ने वैसे तो कई प्रकृति के कठोर घाँव भी सहे थे। कोयना क्षेत्र में आया जलजला हो या कृष्णा-कोयना की बाढ़ हो, बढ़े-बढ़े तबाही के मंजर भी देखे थे इस क्षेत्र ने। मानना पड़ेगा कृष्णा-कोयना के अंचल में रहने वाले बाशिंदो के जिगरे को...तबाही के बाद भी ऐसे उठ खड़े हुए मानों कुछ हुआ ही नहीं था ! 

त्रासदियाँ किसके जीवन में नहीं आती? हार कर बैठ जाएं यह फ़ितरत ही नहीं थी यहाँ के लोगों की। नेता भी ऐसे जो जमीन से जुड़े हुए, आम जनमानस की भलाई की चिंता में दिन-रात एक करने वाले और बदले में मिलता क्या था? जन-सामान्य का बेशुमार प्यार। 

कालान्तर में यही क्षेत्र 'शुगर बेल्ट' के रूप में विकसित हुआ और यहाँ के कृषक को मालामाल कर गया। संत गाडगे महाराज जैसे संतों ने ज्ञान की महिमा समझी और यह क्षेत्र विद्यानगरी के रूप में प्रचलित हुआ। महिला शिक्षा के लिए, गरीब जनता के कुल दीपकों तथा कुल वधुओं के लिए, मेघावी छात्रों के लिए कई रियायतें, शिष्यवृत्तियाँ  दी गई और इस कृष्णा-कोयना के गोद में पलते युवाओं के भविष्य का अध्याय सुवर्ण अक्षरों से लिखा गया। 

विभा इन्हीं घाटों पर खेल-कूद कर, पढ़-लिख कर बड़ी हुई और आज अपने देश का नाम उज्जवल करने का जिगरा लेकर आगे बढ़ रही थी। अप्पा ने मित्र मण्डली कों जो काम सौंपा था वह सिर्फ काम नहीं उनकी अब तक की उपलब्धियों की परीक्षा थी। एक इतने बढ़े अभियान का हिसाब-किताब रखना, उसके सभी डाटा को कंप्यूटर में संरक्षित कर उसे पारदर्शी बनाना, लोगों का सही समय पर भुगतान करना, हर विभाग को पैसे का आवंटन कर उसका लेखा-जोखा रखना, पैसे की आवक और खर्च में तालमेल बैठाना और सबसे महत्वपूर्ण, काम को सही समय पर पूरा कर के लेना आसान चुनौती तो थी नहीं!  

अप्पा ने उनकी जिद्द, लगन और परिश्रम को देख कर ही यह काम उन्हें सौंपा था। जहाँ चुनौती न हो, वहाँ मित्र-मण्डली का क्या काम? यह काम उनमें दुनियादारी की असलियत को समझने की क्षमता को विकसित करने के लिए सुनहरा मौका था। आखिर ज़िन्दगी सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं व्यावहारिक ज्ञान से तालमेल की मांग करती हैं ताकि ज़िन्दगी की हकीकतों को समझने में कोई घालमेल न हो!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा , मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में...


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