गर मुझ में बदलाव नहीं, किस काम का है ज्ञान?
सिर्फ औरों को दे उपदेश, बढ़ता नहीं है मान!
औरों के पैरों के अक्सर नज़र आते हैं शूल,
अपनी आँखों के तृण हम कैसे जाते हैं भूल।
परिवर्तन हैं सफल-सुखकर जीवन का मूल।
बिन बदलाव हर ऋतु में उडती नयनन धूल।
स्वागत करों नव सृजन का, लक्ष्य हो सुख- शान्ति।
मंजिल एक, राहें अनेक, सुझाव भांति-भांति।
नवाचार की थाम ध्वजा, जय जयकार करो।
असली-नकली की पहचान से, गुल्लक नित्य भरो।
प्रकृति माँ की करो उपासना, सीख हृदय धरो।
ऊंच-नीच आएं जीवन में, समता रख पीड़ हरो।।
स्वयं-सिद्ध ज्ञान कर अर्जित, पहले छांटो फिर बाँटो।
बदलाव वाणी-व्यवहार में लाओ, सुकून की फसल काँटो।
स्वयं उदाहरण बन दुनिया को नूतन पाठ पढ़ाओ।
अब्दुल-अटल-लाल बन जग में नव-स्वप्न सजाओ।
स्वीकारों नव आचार-विचार, सोच में परिवर्तन लाओ।
हीरे को तराश कौशल से, खुद जौहरी बन जाओ।
झांको अपने अंतस में, अनुशासन हो हृदय- अंचल में।
समय-चक्र गतिमान है, अनुकम्पन हो मन-चंचल में।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।