शीर्षक : आत्मसम्मान
वृक्ष-वल्ली करें काना-फुंसी,
पत्ता-पत्ता करें फूलों से मनमानी,
आशंकित सूर्यवंश-बहुरानी,
गजगति से चले लखन संग मानिनी!
काहे प्रियतम राम नहीं पधारे?
काहे लक्ष्मण हमसे नयन चुरावे?
काहे माँ कौशल्या माथे हाथ न फेरे?
काहे सखी-सहेलियाँ मंगल नहीं गावे?
छोड़ गए लखन सीता वन माही!
कानन-कानन बावरी भटके वैदेही!
हे रघुवीर! क्यों सुध ना लीनी निर्मोही ?
छोड़ गए लखन जंगली प्राणी बिच मोहि?
भिल्लणी ले चली सिया गुरु आँगन में!
पूर्व-भव-कर्मों की डोरी टूटी पल में!
मैं अभागन! जोऊ ठोर गुरु आश्रम में!
क्या भूल हुई रघुवीर, मोडा मुँह पल में?
रघुवंश-अंश पल रहा मम गर्भ में!
शशि-शीतलता, सूर्य-तेज हैं भ्रूण में!
भिल्लणी वचन शूल से चुभे मन में,
धोबी के लांछन सुन परित्यागा पल में!
हे राजन! क्यों हो कान के कच्चे?
सतित्व पर आशंकित लोग नहीं सच्चे!
दाम्पत्य जीवन में विश्वास मोहे भारी,
दशानन-दुर्मति से जंग थी जारी!
मैं राज-पाट-वन सहचरी तुम्हारी!
सुख-दुःख की साथी, अर्धांगिनी प्यारी!
क्यों जान न पाए अंतर-द्वन्द को मेरे?
क्यों जल बिन मछली तड़प रही किनारे?
माटी मोल किया आत्मसम्मान मम पुरुषोत्तम!
क्यों अग्निपरीक्षा दें, सीता-चरित्र है उत्तम!
एकपत्नीव्रता राम, मर्यादा पुरुषोत्तम!
हे वसुंधरा! कुक्षी में दो स्थान माँ, हरो तम!
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई, महाराष्ट्र|
चित्र कलाकार के सौजन्य से....