भाग ४२
वार्षिकोत्सव की सफलता से सभी अभिभूत थे। मित्र-मण्डली का कई दिनों का प्रयास रंग ला चूका था। सफलता का उत्सव जीवन में खुशियों के अनगिनत रंग बिखेर चूका था।
आबा भी तनावरहित नज़र आ रहे थे! 'इंडो-नेपाल सांस्कृतिक समिती' का सम्मान समारोह पूरी गरिमा के साथ सम्पन्न हुआ था! सभी कार्यकारिणी के सदस्यों ने आबा की कार्यक्षमता और समर्पण की भूरी-भूरी प्रशंसा की थी।
आबा को आज भी नेपाल से आए विशिष्ठ अतिथियों व्यवस्था देखनी थी! भोर में 'मुम्बई दर्शन' के लिए प्रस्थान करना था! हॉटेल में सिर्फ विनय के माता-पिता ठहरे थे और एक कमरा आबा ने अपने लिए रक्खा था ताकि नेपाली दम्पति की व्यवस्था में कोई कमी न रहें!
अक्सर कार्य सम्पन्न होने के बाद यजमान अतिथियों को अनदेखा करते हैं और सारे किएं-कराएं पर पानी फेर देते हैं लेकिन आबा निष्णात खिलाडी थे! गोलपोस्ट पर आ कर गेंद को गोल में डालने में वो माहिर थे! वो जानते थे कार्यपूर्ति के बाद का मान-सम्मान अतिथि के दिल-ए-दिमाग़ पर गहरा प्रभाव डालता है और मानस पटल पर हमेशा हमेशा के लिए अंकित हो जाता है।
यश की माँ कमला जी और वैदेही की माँ जानकी जी घर लौट चुकी थी। प्रतिभा जी भी राजरानी जी को हॉटेल पहुंचा कर, उनकी व्यवस्था का जायजा लेकर घर पहुँच गई थी! हॉटेल में सिर्फ आबा और उनका ड्राइवर था नेपाली दम्पति का खयाल रखने के लिए!
आबा ने सबको सुबह साढ़े पांच बजे तैयार रहने को कहा था ताकि उन्हें वहीं से साथ लिया जा सकें! 'ट्रैवेलर' के ड्राइवर को सुबह पांच बजे गाड़ी लेकर हॉटेल के बाहर पहुँचने को आबा ने कह दिया था! सब से सलाह-मशवरा लेकर एक के नेतृत्व किया गया काम शत प्रतिशत सकारात्मक नतीजे देता हैं यह तो सर्व-विदित है ही।
आबा का अनुभव, दृढ़ता और कर्मयोगी-सा भागीरथ प्रयास किसी भी जिम्मेदारी को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने में बड़ा योगदान देता था! रात-दिन एक कर लक्ष्य का पीछा करने का हुनर उनमें कूट-कूट कर भरा था। वज्र में भी यह गुण साफ़ नज़र आ रहा था!
विभा के माता-पिता भी घर पहुँच चुके थे! उन्हें अपने काम से परसों मंत्रालय भी जाना था और उसकी तैयारियाँ भी करनी थी। वो जानते थे परसों इस काम के लिए उन्हें समय नहीं मिलेगा क्योंकि उन्हें सुबह-सुबह ही निकलना था!
यह एक अजीब संयोग था कि सभी जोड़ियाँ सालों बाद कल घूमने जाने वाली थी! अक्सर बच्चों के भविष्य को संवारते-संवारते वे अपना मनचाहा करना, जीवन को अपनी मर्जी से जीना, आँगन में बिखरे पारिजात के फूलों सी अपनी नन्ही-नन्ही खुशियाँ समेटना मानों भूल ही चुके थे! वक़्त के प्रवाह के साथ वो बहते जा रहे थे, बिना कोई शिकवा-गिला किए... ख़ामोशी से। बहुत दिनों बाद अपने मन का करने का मौका आया था और उससे वो किसी भी कीमत पर चूकना नहीं चाहते थे! सब यहीं कह रहे थे, " कल का क्या भरोसा, क्यों न आज में जी भर जिएं "
परिंदों की चहचहाट के साथ ही प्रतिभा जी तैयार हो चुकी थी। सलवार-कमीज में वह बड़ी प्यारी लग रही थी! उनके तीखे नयन-नक्श, गेहूआँ रंग इस परिधान में निखर कर आ रहा था। आबा ने प्रतिभा जी के लिए बड़े शौक से यह ड्रेस ख़रीदा था! प्रतिभा जी ने पर्स में चश्मा, मोबाइल, रुमाल और एक पहचान पत्र रात को ही रख दिया था। उन्होंने मैचिंग पर्स उठाई और जानकी जी को फोन लगाया। वह उनके साथ ही आनेवाली थी! दोनों समय पर हॉटेल के लिए निकल पड़ी!
बहुत दिनों बाद युवा-ब्रिगेड चैन की नींद सो रही थी!
अक्सर उनके मस्तिष्क में भविष्य के प्रोजेक्ट्स पर विचार-विमर्श चलता रहता था और अवचेतन मन में नए- नए अभियानों की रुपरेखा जन्म लेती थी! आज छुट्टी का दिन था। सभी घर के बड़े-बूढ़े भोर में ही निकल चुके थे 'मुम्बई दर्शन' के लिए! सुबह के सुनहरे सपने उनकी नींद में खलल ड़ाल रहे थे लेकिन वो टस से मस नहीं हो रहे थे!
आबा ने सब को निर्धारित समय पर पिकअप कर लिया और गाड़ी 'महालक्ष्मी' की तरफ दौड़ने लगी! भोर की सर्द हवा कान में घुस कर तांडव न मचाये इसलिए सभी खिड़कियां बन्द कर दी गई थी लेकिन द्वार से झाँक कर घर आए मेहमान को निहारती नन्ही बिटिया सी हवा खिड़की से झाँक कर परदों की ओट में छुप रही थी और शरीर में सिहरन पैदा कर रही थी! इक्का-दुक्का टिमटीमाता तारा उनकी बच्चें सी मासूमियत को देख मुस्कुरा रहा था और चाँद भी अलविदा कहने के लिए उतावला हो चूका था।
जाड़े की अड़ियल, नटखट रात अभी भी रेशमी रजाई में दुबक कर सो रही थी और सभी मन्दिर की तलहटी तक पहुँच गएँ थे। दोनों तरफ छोटी-छोटी दुकाने खुली थी क्योंकि उन्हें पता था कि माता महालक्ष्मी जी के भक्त भोर में ही दर्शन के लिए आ जाते हैं! आबा ने सभी परिवार के मुखिया के हाथ में सुन्दर कमल पुष्प, फूलमाला तथा मिठाई से सजी टोकरियां थमाई और धीरे- धीरे सब मन्दिर की सीढ़ियां चढ़नें लगे!
ठण्डी-ठण्डी बयार गालों पर थपकियाँ दे कहकहें लगा रही थी और पूछ रही थी, " अरे! इतनी जल्दी थक गएँ? अभी तो शुरुआत है.. अभी बहुत दूर तक जाना है! माँ के दर्शन इतनी आसानी कैसे होंगे? 'जोर लगा के हैय्या'...बढ़ते रहो.. माँ का फैला आँचल बुला रहा है तुम्हें...और थका-हारा मन फिर उत्साह-उमंग से भर जाता!
माँ के दरबार का अद्भुत नजारा था आँखों के सामने!
दूर-दूर तक फैले महासागर के माथे पर सूर्य की सहस्त्र रश्मियाँ ग़ुलाल उछाल रही थी और सूर्य हौले-हौले अवतरित हो रहा था! एक तरफ सृष्टि का अविस्मरणीय लावण्य और दूसरी ऒर माँ महालक्ष्मी जी का अतुलनीय, करुणामय, मनोहर वरद हस्त!
माँ के दरबार में आते ही सब की थकान छूँ-मंतर हो गई! सभी ने माँ के दर्शन किए, भोग लगाया और प्रदक्षिणा दे सभी कुछ पल गर्भ गृह के बाहर बैठे। प्रतिभा जी, जानकी जी जब माँ का महिमा स्त्रोत्र गाने लगी तो सारा आसमन्त सुर-लहरियों से गूंज उठा! सभी उपस्थित भक्तों ने उनका साथ दिया! सब के चेहरे पर एक अजीब सी आभा नज़र आ रही थी! सभी अपनी आँखों की पुतलियों में माँ को प्रतिष्ठापित करना चाहते थे! किसी का भी माँ के सामने से उठने का मन नहीं कर रहा था लेकिन बढ़ती भीड़ को देख सभी पीछे की सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे! पुरानी यादें टटोलते हुए आबा ने संज्ञान लिया कि अब वहाँ से सागर की चट्टानों के बीचो-बीच जा कर बैठने का रास्ता जाली लगा कर बन्द कर दिया गया हैं, कुछ अनहोनी घटनाओं के बाद! सभी वहाँ चट्टान पर बैठ सागर का रूप निहारने लगे।
चट्टानों को चुम कर, माँ का आशीर्वाद ले कर लौटती सागर की लहरों का अनवरत शोर मन को लुभा रहा था! कितनी अजीब बात हैं न...रोज ये लहरें माँ के चरण छूँ ने आती हैं, पल भर ठहर कर, धीमी हो कर माँ के आगे नतमस्तक हो कर फिर सागर की गहाराइयों में विलुप्त हो जाती हैं! रोज-रोज यही प्रक्रिया दोहराने का क्या प्रयोजन हो सकता हैं? क्या उन्हें आलस्य-थकान महसूस नहीं होती? या यह दीवानगी हैं आदिशक्ति के दर्शन को उतावली उन लहरों की?
मन के सागर में सवालों की असंख्य लहरें उठ रही थी... समय की रेत पैरों तले से खींच कर लें जा रही थी और मन सम्मोहित हो उन्हें अपलक निहार रहा था.. न तो कहीं कोई आदि-अंत का छोर नज़र आ रहा था न कहीं कोई धरा-गगन के अटूट रिश्ते की झिणी-झिणी रेशम-डोर! माँ का हाथ झटक कर दौड़ते बच्चें सी नटखट, पैरों को छूँ कर जाती लहर का स्पर्श अजीब सा सुकून पहुंचा रहा था!
सूरज के रथ के घोड़े अब अस्तबल में लौट चुके थे! समंदर की सतह तारों सी जगमगाहट से दमक रही थी! सभी के पेट में चूहें दौड़ने लगे थे! पहाड़ी पर एक छोटा सा हॉटेल था! वहाँ के दाल-पकौड़े बहुत ही प्रसिद्ध हैं! आबा ने सबको वहाँ इकठ्ठा किया और अपनी पसंद के हिसाब से नाश्ता मंगवाने के लिए कहा! हॉटेल के मालिक को उन्होंने पहले ही कह दिया था कि बिल का भुगतान वह करेंगे!
यहाँ के दाल-पकौड़ों का स्वाद ही कुछ अलग होता हैं! सभी नें नाश्ते का आनन्द लिया और सब पुलकित हो सीढ़ियाँ उतरने लगे! अब तक भीड़ बढ़ चुकी थी और गुनगुनी धूप तेज तपन में बदल चुकी थी। आबा ने ड्राइवर को फोन किया और गाड़ी को करीब बुलाया! सभी 'ट्रेवलर' गाड़ी में बैठ निकल पड़े थे अगले गतंव्य कि ऒर..
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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