शीर्षक : पावन धाम!
स्फटिक सा सुन्दर निर्मल तन-मन!
प्रकृति माँ से नहीं हैं हमारी अनबन!
रच्चणहारे का यही अनुपम वरदान!
जीव-जन्तुओं को देता अभयदान!
स्वस्थ शरीर सुधारे तक़दीर, तस्वीर,
जीवन में बहे ठण्डी खुशनुमा बयार!
स्वस्थ शरीर ईश्वर का पावन धाम!
पूजा-अर्चना-भक्ति यही बाकि काम!
स्नेह-नेह भरे विचारों से रोशन धाम!
मन-मन्दिर में अच्छे-बुरे का संग्राम!
समतोल-भोजन नित्य व्यायाम राज,
दीन-दु:खियोंकी सेवा ही ईश्वर-काज
जीवन जीना है मस्ती में मुस्कुरा कर,
दर्द बाँटकर या किसी से साँझा कर!
किसी के आँसू पोछ मन शुद्ध कर, मदद दे तो किसी को सहारा दे कर!
मन चंगा तो कठौती में होगी गंगा,
तन सुदृड़, सशक्त तो कोई न ले पंगा!
स्वस्थ काया जीवन फ़ौलादी पाया!
स्वस्थ आचार-विचार से दीर्घ जीवन पाया!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!