मेरी नानी


मेरे नानीसा

"नानीसा, गरम-गरम चूरमा लड्डू दो। बहुत भूख लगी है।"
" नानीसा, आपका गुलकंद कहां है?"
" मीठी सुपारी दो।"
" जाओ, पहले नाश्ता करो। मंदिर जाना है।" 
नानीसा के पास माता जी से ज्यादा लाड लगाते हम। उनके हाथ का बना ईडली, चटणी, सांबर..और कितने ही स्वादिष्ट व्यंजन। 
वाहहहहह! याद आते ही मुँह में पानी आ जाता है। नानीसा के हाथों बना आम का अचार। आज तक समझ नहीं पाई, यह उनके हाथ का कमाल था या कच्चा आम स्वाद था। कितने प्यार, जतन से बनाती थी खाना, खाते जाओ, उंगलियां चाटते जाओ, फिर भी मन न भरे।
चूरमा, मसालेदार नमकीन चणा दाल, आम के पापड, घर की बनी सेवईयां का उपमा (मॅगी से भी स्वादिष्ट), मजा आ जाता। 
आज न तो नानीसा, मामीसा, माताजी या सासुजी रही, जिनके हाथ के जादू के कमाल से हमें तृप्ति मिले।
चटकारे लेकर खाना हम भूल ही गये है। 
जैसे उनके साथ स्वाद, महक न जाने कहां खो गई। 
रसोई  के साथ-साथ यादें बहुत सी जुडी हैं।
नानीसा का पुछना,
" आ गयी बेटा?"
वो उनकी आँखों की चमक, खुशियां, सिर पर हाथ रख आशिर्वाद देना, नम हो रही हैं आँखें।
उनकी बाहों में प्यार दुलार का खजाना था। 
विदा करते दी हुई  हिदायतें,
" अपना ध्यान रखना। सबका ध्यान रखना।"
" सबको याद करना।"
" छोटों को प्यार, बडों को प्रणाम कहना।"
नजर ढूँढती रहती है, कोई  बडा सिर पर हाथ रखकर आशीष दे।

स्वरचित  मौलिक  संस्मरण 
चंचल जैन
मुंबई,  महाराष्ट्र
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • वाह! सुन्दर
  • खूबसूरत प्रस्तुति
  • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।
  • क्या खूब लगती है, बड़ी सुन्दर दिखती है ❤️❤️❤️❤️