देख भूस्खलन आपदा, दरक रहा गिरिराज है।
गारा, मिट्टी लें बहा, बचा कहाँ अब काज है।
आशियाने दफना गएँ, पशु-पक्षी गण मानवी।
बादल ऐसे हैं फटे , सृष्टि रूप अब दानवी।।
लगी वक़्त की ठोकरें, राजा पल में रंक है।
सभी भुक्तभोगी सहें, नाग राज का डंख है।
कल जहान आबाद था, कराहतीं अब घाटियाँ।
मुखिया मलबे में दबा, मौन हुई हैं लौरियाँ।।
छेड़-छाड़ माँ से किन्ही, देख नतीजा लोभ का।
प्रकृति मातु अवहेलना, दण्ड सहे मनु क्षोभ का।
तोड़ संतुलन सृष्टि का, बचे-खुचे तुम जीव हो।
मत विनाश गाथा लिखो, सन्मति की तुम नींव हो।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।