अकेले चल कर देख... कुछ दूर अकेले चल कर तो देख़,
वक़्त के भाल पर तू लिख दे लेख!
खुदा की मर्जी में नहीं मीन-मेख,
माथे की लकीरों का पढ़ आलेख!

अकेले तू आगे बढ़ता ही चल,
काँटों पर चलने की जारी पहल!
प्रवाह के विरुद्ध तैरने का हो बल, 
विरोध के स्वर जाएं हाँ में बदल।

वक़्त पल-पल लेगा तेरा इम्तिहान,
खुद ही बनानी हैं खुद की पहचान!
लक्ष्य पर गाड़ दो अपने तीखे नयन,
नूतन मार्ग का तुम कर लो चयन!

तूँ भीड़ में अकेले चलना सीख लें,
नित नई मंजिलों का कारवाँ ढूंढ लें! 
आँधियों से भिड़ने का हुनर जान लें,
अनुभव की थाती को पहचान लें! 

भूली-बिसरी यादों के शामियाने तले,
औरों की दुनिया महफूज़ रखने चले!
तन्हाईयों में खुद से गुफ़्तगु कर ले,
चलों! आज ठहर कर हम भी देख़ लें!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
 




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