शीर्षक - गुरु बिन ज्ञान कहां से पाऊ?
गुरु बिन ज्ञान कहां से पाऊ?
अज्ञान तिमिर कैसे हर जाऊ?
मैं बालक! मंद, अबोध, अज्ञानी,
वेद-शास्त्र, धर्म-मर्म कछु न जानी!
गीता, कुरान, बाइबल, गुरुवाणी!
आगम, उपनिषद्, ज्ञान की खाणी!
आतम ज्ञान ज्योत, कैसे प्रकटाऊं?
गुरु बिन ज्ञान, कहां से मैं पाऊ?
मैं मूढ़! कैसे बनु पंडित, ज्ञानी?
गुरु बिना कौन समझाएं वाणी?
गुरु! मैं काष्ठ, आप श्री हुनर के धनी!
छीलत, गढत मूरत बहुविध सोहनी!
सद्गुरु! आप कुम्हार, मैं गीली मिट्टी,
दे आकर कुशल हाथ, चक्के पे मिट्टी!
गुरुवर! मैं भीगे आटे की कच्ची लोई,
अंगीठी चढाई आप फुल्का मृदु पोई!
गुरु! तुम बिन ना मोक्ष, ना हैं मुक्ति !
गुरु! तुम कृपा बिन निरर्थक भक्ति!
गुरु! ब्रम्हा, विष्णु, गणाधिश, ज्ञान प्रदाता!
गुरुकृपा बिन कैसे हो भव पार विधाता?
गुरु सुमिरण सु सफल मनुज जन्म भारी!
गुरु चरण रज देव, धर्म, दर्शन हितकारी
रचनाकार का नाम :-कुसुम अशोक सुराणा, पवई,
जिला:- मुंबई, राज्य: महाराष्ट्र: