किसे फुर्सत है यारों..

किसे फुर्सत हैं यारों..

बीती रातों का दुखड़ा सुनने की?

कुम्हलाएँ फूल सा मुखड़ा देखने की?

पलकों में ठहरे आँसू गिनने की?

फटी गुदड़ी को सिने-सिलाने की?

घाँवों पर मरहम-पट्टी करने की?

काँटों पर भी कहकहें लगाने की?

किसे पर्वा हैं यारों...

राख सी बुझी-बुझी ज़िन्दगी की?

भीड़ में अपनों को ढूंढ़ती नज़रों की?

जीवन-चक्र में उलझी उम्मीदों की?

रिश्तों के जाल में उलझे बुजुर्गों की?

थरथराते हाथों से छुटती डोर की?

पैरोंतले से फिसलती झीणी रेत की?

किसे फर्क पड़ता हैं यारों...

आशियाने के बिखरे ईट-गारे से?

पुराने बर्तनों की उतरी कलाई से?

कालबाह्य आस्था, परंपराओं से?

एकाकी नौनिहालों के रुदन से?

माँ के दूध को तरसते शिशुओं से?

आपसी प्रतिस्पर्धा में टूटते रिश्तों से?

स्वरचीत तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |

 

 

 

 

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