यारियाँ...

वो पक्की यारियाँ, वो दोस्ती की मजबूरियाँ, वो महकती केसर-क्यारियां किसे बताऊँ मैं ये कहानियाँ? इन्ही के भरोसे थी हमारी दुनिया!
यादों के परिंदे जब तन्हाईयों में विशाल वटवृक्ष पर आ सो जाते हैं तो खुद से ही ईर्ष्या होने लगती हैं! भोर की आहट पाते ही चले जाते हैं ये पंछी अपने-अपने गंतव्य की ऒर...पीछे रह जाती हैं वो सुनहरी स्मृतियाँ... जिन्हें याद कर ज़िन्दगी जी रहे हैं हम!
वक़्त ने एक-एक कर सभी को कोसों दूर भेज दिया मगर दोस्ती के रेशम धागे आज भी अपनी चमक बनायें हुए हैं!
महाविद्यालय की पढ़ाई जारी थी... वाणिज्य शाखा में लड़कियाँ नाम मात्र थी मानों वाणिज्य, अभियांत्रिकी, फार्मेसी यह क्षेत्र लड़कियों के लिए थे ही नहीं! इक्का-दुक्का लड़की कला क्षेत्र में नज़र आती थी मगर लक्ष्य तक पहुँचने के पहले ही उसका शिक्षा अभियान दम तोड़ देता था!
मैं भी प्रवाह के विरुद्ध ही तैर रही थी मगर मुझे मेरे माता-पिता का पूरा सहयोग था!
खेल का मैदान मुझे बहुत आकर्षित करता था! सांघिक खेलों की बदौलत मेरे अंदर गज़ब का आत्मविश्वास, जिद्द, जुनून और जीवट थी! कब्बडी, खो-खो की खिलाडी होने की वजह से एक-दूसरे के साथ तालमेल बैठा कर जीत की ऒर अग्रेसर होना मैं बखूबी जानती थी! खेल ही था जिसने मुझे सवा सौ विद्यार्थियों की कक्षा में अकेले बैठ कर पढ़ने की हिम्मत दी थी!
सभी से मेरी मित्रता थी! कभी नोट्स के बहाने तो कभी किसी साहित्यिक कार्यक्रम की तैयारी के बहाने मित्रों का परिचय होता और सभी का सहयोग प्राप्त होता! हमारे कॉलेज की कला, वाणिज्य तथा विज्ञान ये तीनों शाखाएं थी! अब कैंटीन के बहाने मेरी दूसरी फैकल्टी की लड़कियों से भी मित्रता हो गई थी! वह ऐसा दौर था जब लड़कियों को शिक्षा की ऒर आकर्षित करने के लिए शिष्यवृत्ति दी जाती थी!
महाविद्यालय का मिलाजुला वार्षिकोत्सव था! कॉलेज की 'लेडीज रिप्रेजेंन्टेटिव' होने के नाते मेरा भाषण भी था! हमने मिलकर एक नाटक का मंचन किया था! सभी मित्रों की प्रतिभा का परिचय हमें पहली बार ही हुआ था! एक सहेली हमेशा संगीत स्पर्धा में प्रथम आती थी तो दूसरी तरफ फुटबॉल में हमारा सहपाठी ही टीम का नेतृत्व करता था! अब बारी थी साहित्य की! हम सब ने मिलकर एक हस्तलिखित किताब का विमोचन किया था! उसका मुखपृष्ठ बनाने का जिम्मा मुझ पर था! यह एक साझा प्रयास था जिसमें सबकी साहित्यिक तथा रचनात्मक प्रतिभा का सम्मान था!
आज भी वार्षिकोत्सव की वह रात याद है जब हम कृष्णा-कोयना के संगम पर बने पुल से गुजरते हुए अंताक्षरी का मजा ले रहे थे!
चांदनी में आकंठ नहाई रात, पूर्णमासी का मुस्कुराता चाँद, हौले से तन को छूँ कर जाते ठण्डी हवा के झोंके और गीतों के सुन्दर बोल... खुशनुमा बयार के साथ नाचते-गाते पता ही नहीं चला हम कब गांव में पहुँच गएँ! साथी मित्रों ने हमारा घर तक साथ दिया और यादों की खुशबू पीछे छोड़ वो अलविदा कह कर चल दिए!
न बचपन की दोस्ती भूल सकते है न जवानी की सखा-सहेलियों संग बिताई लम्बी रातें...
आज वक़्त की आँधियों में परागकणों से सब यार-दोस्त यहाँ-वहाँ बिखर गयें हैं लेकिन उन लम्हों की यादें आज भी दिल के बंद किवाड़ों पर दस्तक देती हैं ... नशा सा चढ़ जाता हैं इन स्मृतियों का मानों पुरानी शराब!
कम्बख्त! कहाँ खो गई वो यारियाँ? वक़्त के फलक पर उभरें कजरारे बादलों की आड़ में या फिर अस्ताचल का सूरज निशा के गर्भ में?

स्वरचित यथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!


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