मायलड़ी म्हारी.. मायलड़ी म्हारी...
शीर्षक: मायलडी म्हारी! 
 

मायलडी म्हारी! देखण दे संसार,

कुक्षी में थारा दे दे म्हा सूं विस्तार!
स्त्री-भ्रूण जाण पालो न म्हा सूं खार,
थोड़ी सी हिम्मत से कर दो बेड़ा पार!
 
नानो सो जीव! म्हासूं करो न बैर,
थारो अंश हूँ मैं, नहीं हूँ मैं गैर!
कर्मों रा कैसा हें जी यें उल्टा फेर? 
विनवू जी मायर वाली, भ्रूण-हत्या में न करो म्हानें ढ़ेर!
 
मायर म्हारी! कोख में मार कल पछतावो भारी,
फटी चुनर-चोली नें क्यों लगावो कारी?
मायलड़ी म्हारी! बळती आग सा करों  तेवर,
मत परणावो म्हाने मायालड़ी म्हाने नानी उमर!
 
जामाण जायी... क्यों बोले दोरी-दोरी?
थारा आँगन री म्हे तों केसर क्यारी!
मूंगा मोल रा करू न ज़िद, शौक भारी,
थारा हिवडा रो हार बन हरु म्हे देनदारी!
 
कर परिजन री सेवा उतारू कर्ज सारा,
दूध रो मोल चुकाऊं, वधाऊ मान थारा!
महल-मेरी न मांगू, न मांगू हिस्सेदारी,
कालजा नें ठारु, कुल री शोभा न्यारी!
 
मायलड़ी म्हारी! दीजे अभय दान म्हाने,
वंशवेल बढाऊ पराई, दूँ शीतलता थाने!
दहेज़-असुर मार बनु म्हे मर्दानी थोरी!
अन्तरिक्ष नाप आऊं, जोडू पुनवानी भारी!
 

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!

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