शीर्षक : माटी के पुतले!
माटी के पुतले तू क्यों करें मनमानी,
क्यों रौन्दे चिकनी मिट्टी डाल पानी?
नश्वर देहधारी, जाने न तू निज कहानी,
माटी मोल काया, माटी में मिल जानी!
वक़्त का पहिया घूमेगा तेज रफ़्तार भारी, भव-भव के चक्कर लगाएगा बारी-बारी!
कुम्हार रच्चनहारा, कलाकार बहु भारी,
ऊँगलियाँ देगी आकार, रूप मनोहारी!
कभी तपेगा भट्टी में, कभी शीतल पानी!
अंग-अंग अगन कभी ठंडक सुहावनी!
वस्त्र तेरे मटमैले, तन-मन हैं शुद्ध-बुद्ध,
लक्ष्मी देख डोले नहीं दीन-हीन भाव शुद्ध!
ऊँगलियों का जादूगर, गज़ब सृजनकार,
गीली मिट्टी को देता कल्पना से विस्तार!
कर्मयोगी की भूमि, श्रम का हैं बोलबाला,
घट-दीप, गुड्डा-गुड्डी, राधा संग नन्दलाला!
स्वेद-बूँद से पावन माटी में निपजे खुद्दारी,
कृश-काया, शुष्क अधरोंपर बजे बांसुरी!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र|