'श्रमिक दिवस' तथा 'महाराष्ट्र दिवस' की लख लख बधाइयाँ! चेहरे पर स्वेद के मोती,
धूप में जली श्यामल चमड़ी,
मेहनत-मश्शकत से कसे बाज़ू, 
सिर्फ दो वक़्त रोटी की आरजू।
पत्थर ढोते-ढोते टूटी कमर,
सिर पर ईट-बालू से भरे टोकरे,
पास मिट्टी में खेलता नन्हा बेटा,
फटी फ्राक पहन ईंटें जमाती बेटी।
पैबंद लगी साडी से झांकती लाचारी,
घांस-फूंस की झोपड़ी में मुस्कुराती,
नवजात शिशु को दूध पिलाती,
फटे पल्लू से ढक सहलाती,
दुनिया की बूरी नज़र से बचाती,
बिखरे बालों को संवारती बांधती,
गठीले बदन को चिथडों से छुपाती,
मजदूर की काली कोयल सी बीबी,
ठेकेदारों की गंदी फब्तियों को, 
अनसुना कर रेत, सीमेंट उंडेलती,
अपनी कमाई पाने गिड़गिड़ाती, 
तन, मन से मजबूत घरवाली।
अपने ही अरमानों को दफन कर,
इमारतों की मंजिलों को खड़ा कर,
अट्टालिकाएं निर्माण कर नि:शब्द हो,
आसमान से बातें करते-तांकते, 
खाली बर्तन में झांकते, 
बूंद-बूंद को तरसते, मिलों चलते, 
बच्चों पर अपनी खीज निकालते,
बेबस, बिगडते-झगडते मजबूर,
वतन के निर्माण में खुद अस्त-व्यस्त,
जीवट, जिजीविषा के धनी मजदूर।

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई महाराष्ट्र!
 








इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • मस्त
  • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।
  • बहुत खूब वीणा जी! पुरानी स्मृतियों में आँसू और मुस्कान का इंद्रधनुषी जलवा नज़र आता हैं।
  • बहुत ही दिल को छू लेने वाली