गुलाबी अधरों को चुम मैंने सोचा इश्क़ करूँ,
चंपा, चमेली, महुआ मेहंदी रची हथेलियों पे धरूँ!
होठों से जो पिलाई पिया, नशा अब भी बाकी है..
जाम छलक गया मगर खुमार अब भी बाकी है ....
तेरी जुल्फों के साये में, रात भले ही गुजरी हो ....
आँखों की पुतलियों में यारा, छवि तेरी ही उभरी है
इतना गुमान क्यों है यारा तुम्हे खूबसूरती पर?
क्या आईना छुपा पायेगा राज तेरी बेवफाई का ?
चंद लम्हे ही सही गुजरे तेरी बाहो में यारा ....
पँख फैला छू लिया मैंने नीला अम्बर यारा
दिल की कलम से लिखी दास्तां है यारा ....
ये स्याही नहीं, रगों में बहता खून है यारा ...
इश्क की राह में, ऐसा भी मुकाम आया है ...
सब कुछ लुटा के होश मुझ को आया है ....
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |