वो पहला प्यार...

वो पहला प्यार
✍️ कवि – विजय शर्मा एरी (Vijay Sharma Erry)

वो पहला-पहला एहसास था,
न कोई वादा, न कोई प्यास था।
बस उसकी एक मुस्कान थी,
और दिल मेरा बेक़रार सा था।

लखनऊ की उन भीगी गलियों में,
जब साथ चलते थे सावन की टहनियों में।
उसके रुख़ से उठती थी ताज़ी बयार,
जैसे मौसम खुद ले आया हो बहार।

हम साथ पढ़ते थे, किताबों में खो जाते,
अक्सर एक-दूजे की कॉपी में दिल बना जाते।
कभी एक सवाल पर बहस भी होती,
पर मैं हारकर भी उसकी जीत पर मुस्कुरा जाता।

बग़ीचे की उन ख़ूबसूरत कलियों के बीच,
हमारी हँसी गूंजती थी धीरे-धीरे खींच।
कभी झूले पर, कभी पेड़ के नीचे,
उसका नाम कानों में पड़ते ही मन हिचके।

वो मुझे चिढ़ाती, मैं नाराज़ हो जाता,
फिर उसका "सॉरी" कहना, जैसे दिल बहला जाता।
हर रूठने में एक मीठा सा प्यार था,
हर मान जाने में एक गहरा इकरार था।

वो बारिश की बूंदें, और उसकी भीगी ज़ुल्फ़ें,
उस पल के आगे क्या कोई तोहफा तौल सके?
कभी बोरियत में भी वो बगिया बन जाती,
उसकी बातें मेरे दिन को रातों तक सजाती।

प्यार तो आज भी है, पर वैसा मासूम नहीं,
अब भावनाओं में भी थोड़ी सी दूरी रही।
पर उस पहले प्यार का स्वाद कुछ और था,
बिना कहे सब कह जाना, वो दौर और था।

अगर आपके दिल में भी बसी है कोई पहली मोहब्बत की मीठी याद,
तो कमेंट में ज़रूर लिखिए — वो पहला प्यार कभी भुलाया नहीं जाता।

💖🌧️🌸


द्वारा Vijay Sharma
Shared25 Jul 2025
Start 24 Jul 2025
End 24 Jul 2030
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत सुन्दर
  • पहली बारिश में हुई प्रिय से मुलाक़ात। मिट्टी की सौंन्धी खुशबू से भीगे जज़्बात।। धड़कनों की धुन में खोई प्रिया बावरी। दुपट्टे की ओट से छुप-छुप निहारे सावरी।। छैल-छबिला पौरुष देख मौन षोडशी। भाल पर रेखाएं अंकित हैं केतकी की।। तेजस नेत्र जैसे भरे हो मय के प्याले। रेशमी शेरवानी कन्धे पर उपवस्त्र काले।। देख राजसी रूप प्रिया दिल दे बैठी। पहली नज़र का प्यार जानें जग श्रेष्ठी।। सृष्टि बरसाएँ कुसुम पंखुड़ियाँ हो मस्त सुरभित परागकण उड़ा हुई हवा व्यस्त।।
  • बहुत सुन्दर प्रस्तुति 😍😍❤️😍😍
  • क्या खूब लगती है, बड़ी सुन्दर दिखती है ❤️❤️❤️❤️
  • अत्त्युत्तम सृजन। जय हो।