पूर्णिमा!

रात की कुक्षी में पल रहा, शुक्ल-पक्ष का चंद्रमा!

रक्त-बीज पनप रहा ले माँ के गर्भ-जल से लालिमा!

शनै-शनै शशि... शिशु सा, बढ़ रहा गर्भ-मांस-रुधिर में!

टुकुर-टुकुर निहारता, मुस्कुराता सारंग रैन कुटीर में...

पूर्ण मासी गर्भवती सी, दमकती रही है पूर्णिमा! 

श्वेत-कमल सी हँसी,  मन मोहिनी भाव-भंगिमा!रोशनी से जगमगाता जहाँ, बादलों से  झांकता चंद्रमा!

खुशनुमा बयार के चुंबन से, उन्मत्त है मधुरिमा!

पूनम की चांदनी में, नहा रही है निर्वस्त्र निशा!

छुप-छुप सूरज निहार रहा यौवन की स्वर्णिम उषा!

आदित्य की देख उदंडता, पानी-पानी हुई प्रियंवदा!

शुष्क होंठ, सिले-सिले, मुखर व्यथा यदा-कदा!

पूर्णिमा की रात मादक, चढ़ा नशा हौले-हौले प्रीत का!

मदन के आगोश में समाई, भ्रमित सुवर्ण मृग-मरीचिका!

सुवर्ण कंचुकी को ललचाई वैदेही, भूली लक्ष्मण रेखा!

साधुवेश में देख दशानन, छल-कपट से आतंकित पूर्णिमा!

स्वरचित तथा मौलिक, 

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |

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