भाग ४०
समय को पँख लग चुके थे.. वह नीले आसमान में ऊँची उड़ान भर रहा था! अंतरिक्ष की सीमाएँ उसके लिए बेमानी हो गई थी। कला और मानवता के नवल आयामों को जोड़ता यह सप्तरंगी इंद्रधनुष दो करीबी संस्कृति-सभ्यताओं के बीच के मधुर मिलन का प्रमाण था!
नेपाल से आ रहे विनय के माता-पिता वीरबहादुर सिंह थापा जी तथा उनकी पत्नी राजरानी थापा जी को लेने आबा एयरपोर्ट पर पहुँच चुके थे! वैसे तो वह और किसी को भी उन्हें स-सम्मान लाने तथा हॉटेल तक पहुंचाने को कह सकते थे लेकिन अपने एकलौते बेटे को जीवन दान देने वाले दम्पति को वह किसी और के भरोसे कैसे सौंप सकते थे? उन्होंने यह दायित्व स्वयं उठाने का निर्णय लिया था और अपनी संस्था को भी अपने विचार से अवगत करा दिया था!
प्लाइट सही समय पर थी और उसके लैंडिंग के समय पर ही आबा ने वीरबहादुर सिंग जी को फोन कर बता दिया था किस तरफ आना है। वो निश्चिन्त हो कर 'निकासी द्वार' पर रुक गए थे! आबा का ड्राइवर भी उन्हें अच्छी तरह पहचानता था। विनय के अभिभावकों को सामान लेकर एयरपोर्ट से बाहर निकलने में कम से कम पैतालिस मिनिट का समय तो लगने ही वाला था!
विनय के माता-पिता को देखते ही आबा ने हाथ हिलाया और जवाब में उन्होंने भी मुस्कुरातें हुए हाथ हवा में लहराएँ! दोनों के बाहर आते ही आबा विनय के पापा से गले मिले और विनय की माताजी का हाथ जोड़ स्वागत किया, " स्वागतम् ! सुस्वागतम् ! भारत में, मुम्बई में आपका स्वागत हैं!"
आबा का ड्राइवर उनका सामान पार्किंग की ऒर ले जाने लगा जहाँ आबा की 'फॉरचुनर' खड़ी थी!
सब के गाड़ी में बैठते ही 'फॉरचुनर' हवा से बातें करने लगी और आधे घण्टे में हॉटेल के बाहर पहुँच गई। 'रॉयल पैलेस' यह एक तीन सितारा हॉटेल था और सागर तट के बहुत करीब स्थित था। अरब सागर का विस्तीर्ण किनारा कमरे की बालकनी से साफ़ नज़र आ रहा था।
साँझ में अस्ताचल के सूरज को धीरे-धीरे फलक पर लालिमा बिखेरते-बिखेरते अंधेरों में लुप्त होते देखने का मज़ा ही कुछ और होता है! किनारे पर मीलों दूर तक फैली भीगी रेत में ख़्वाबों के महल खड़े करना, उनके टूटने पर धरती-आसमान एक कर देना और अंत में हाथ-पैर पटक किनारे की गीली रेत पर पैर पसार अड़ियल बच्चा बन कर बैठने का मज़ा ही कुछ और होता है यह विनय के माता-पिता जानते थे! आज वह थक चुके थे लेकिन सागर किनारे रेत पर बैठने का मोह वह नहीं रोक पाएं!
यादों के परिंदे नील गगन में उड़ान भर कर घरौंदों की तरफ लौट चूके थे! दूर आसमान में चन्द्रमा नज़र आ रहा था और रात की चुनर पर सितारें टीमटीमा रहे थे! पूनम का चाँद देख़ दोनों पति-पत्नी उठ कर खड़े हो गएं और करीब जाकर लहरों के पैरों को छूने का इंतज़ार करने लगे!
हर पल अनवरत शोर करती लहरें किनारे की ऒर दौड़ती चली आती, छुपन-छुपाई खेलती और हौले से पैरों तले की रेत खींच कर सागर की गहराईयों में फिर लौट जाती मानों कह रही हो," क्या-क्या छुपा रक्खा है इस गीली रेत में... शंख, सीप? देख ! मैं चली उन्हें ले कर सागर के आगोश में! " और अगले ही पल समंदर की गहराईयों में लहर समा जाती और वह तांकते रह जाते असहाय से!
सागर के सामने खड़े रहकर, आसमान की टोह लेकर उन्हें महसूस हो रहा था कि उनका अस्तित्व एक अणु- रेणु जितना भी नहीं है! रच्चनहारे की ताकत का अंदाजा तो उन्हें था लेकिन इस दम्पति के जीवट का अंदाजा शायद रच्चनहारे को भी नहीं था!
उन्होंने ड्राइवर को बुलाया और दोनों लौट गएँ हॉटेल की तरफ! कल चार बजे से ही सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा सम्मान समारोह का शुभारम्भ होनेवाला था! कुछ समय 'टब बाथ' का आनन्द लेने के बाद उन्होंने गर्म पानी से शॉवर लिया और कुछ तनावमुक्त होकर डिनर के लिए चले गएँ !
सभी अभिभावक रात के खाने के लिए हॉटेल पहुंचने वाले थे! सभी विनय के माता-पिता को मिलने के लिए उत्सुक थे! एक तरफ दिल के एक कोने में उनके प्रति कृतज्ञता का भाव था तो दूसरी तरफ गज़ब की सहानुभूति! अपने जवान, एकलौते बेटे के बिछोह का दर्द भूलना इतना आसान तो था नहीं विनय के माता-पिता के लिए लेकिन समस्या का निदान भी तो नहीं था उनके पास! शायद वज्र की मित्र-मण्डली को देख अपने आप को सांत्वना देना यहीं मार्ग था उनके पास दर्द की टीस को कम करने का! जिस उलझन को अदना सा मानव सुलझा नहीं सकता उसे ऊपरवाले के भरोसे छोड़ देना ही उचित था न!
आबा, प्रतिभा जी तथा विनय के माता-पिता आपस में बातें कर रहे थे तभी यश की मम्मी कमला जी और वैदेही की आई जानकी जी भी पहुँच गई! दोनों की अब अच्छी दोस्ती हो चुकी थी! उन्होंने 'मुम्बई दर्शन' के लिए जाते वक़्त कौनसा ड्रेस पहना है से लेकर साथ में क्या-क्या व्यंजन लेनें हैं इस पर भी विचार कर लिया था!
खरीदारी हो या घुमक्कड़ी, स्त्रियां इस मामले में बड़ी तेज होती हैं! खरीदारी हो या घुमक्कड़ी का प्लान बनते ही उनके हाथ मशीन से तेज चलने लगते हैं, काम सम्पन्न करने की रफ़्तार बढ़ जाती हैं, किसी को नाराज करने की जोखिम वह नहीं उठाना चाहती और मेकअप वगैरा भी अतिअल्प समय में निपट जाता हैं! खुद का क्रेडिट कार्ड साथ हो तो बहुत अच्छा और अगर चॉइस हो, पति या पति का क्रेडिट कार्ड, तो वह बिना वक़्त गवाएं बोल देती हैं, 'जी! क्रेडिट कार्ड!' क्योंकि की खरीदारी हो या घुमक्कड़ी, लक्ष्मी जी का वरद हस्त जरुरी हैं जी...बाकि तो वह खुद ही निपट लेगी! बेचारे पति नामक जीव की यहाँ-वहाँ-कहाँ... क्या आवश्यकता होती हैं? बेवजह उनका ब्लड प्रेशर बढ़े तो.... बेहतर हैं वो दूर ही रहे 'खरीदारी' नामक बला से।
हँसी के फव्वारों के बीच विभा की मम्मी पद्मावती जी तथा पिता अप्पा उर्फ़ यशवंतराव जहागीरदार जी हॉटेल में प्रवेश कर चुके थी! अब तक सभी का आगमन हो गया था!
आबा उर्फ विनायक राव पाटिल जी ने औपचारिकता निभाते हुए सबको अपना परिचय देने को कहा! सब नें अपना संक्षिप्त परिचय दिया और सभी डायनिंग हॉल की तरफ बढ़ गएँ!
डायनिंग हॉल किसी विलासी राजा के महल सा झूमरों की जगमगाहट में चमक रहा था मानों पूनम की चांदनी में रात की पेशानी पर चमकते अनगिनत तारें!
दूधिया रोशनी के बीच सभी स्थानापन्न हो गएँ! तीन टेबल साथ में जोड़ दिएँ गएँ थे। टेबल मे तीन जगह गुलदस्ते रखें हुएँ थे और उसमें ताजे रातरानी के फूल खिलखिला रहें थे! हरे-भरे पत्तों के बीच नाजुक रातरानी के नन्हें-नन्हें फूलों की मादक सुगन्ध से सारा हॉल महक रहा था!
शाही भोजन की व्यवस्था देख सभी का मन आह्लादित था। अलग-अलग तरह के शाकाहारी व्यंजन बहुत ही सुन्दर और आकर्षक तरीके से परोसे गए थे! सलाद को प्लेटो मे सजाया गया था और पास में ही नमक, काली मिर्च की सुन्दर ट्रे रखी हुई थी! चटनी, अचार-मुरब्बे का तो क्या कहना... देख़ कर मुँह में पानी आ रहा था! सभी ने अपनी-अपनी फरमाइश बता दी थी अटेंडन्ट को!
पास में ही छोटे से मंच पर एक किशोर गिटार पर गीत बजा रहा था....
"आज जाने की ज़िद न करो,
यूँहीं पहलुँ में बैठी रहो....
आज जाने की ज़िद न करो..."
मन्त्रमुग्ध करता वातावरण, मधुर सुर-लहरियां, स्वादिष्ट व्यंजन और खुशियों से सराबोर दमकते चेहरें! त्रिवेणी संगम से सबका मन अभिभूत था! बहुत दिनों बाद उत्सव मनाने का ऐसा अद्भुत अवसर आया था! सबका दिल बाग-बाग हो गया था!
जीवन भी न जाने कैसा अजीब खेला है! न अगले पल का पता हैं न भविष्य की कोख में क्या छुपा हैं इसका सटीक अंदाजा है! कभी तेज, आँखों को चूँधियाती रोशनी तो कभी मद्दीम, दूधिया चांदनी सी शीतल रोशनी! कभी ऊँचाईयों को छूते सुर तो कभी मन की गहराईयों की टोह लेते सुर! कभी तीखी, चट-पटी चटनी तो कभी रुलाती, फिर भी भाती प्याज़-मिर्च के टुकडों सी कटी-कटी ! कांच के सुन्दर बाऊल में सजा बादाम-पिस्ते से सजा गाजर का केसरयुक्त हलवा हर किसी की किस्मत में कहाँ होता हैं जी?
आबा की व्यवस्था और मेहमाननवाजी से सभी प्रभावित थे! प्रतिभा जी सभी का व्यक्तिगत रूप से पूरा ध्यान रख रही थी! उनकी मनुहार और मितभाषिता नें सबका दिल जीत लिया था! ऐसा लग रहा था मानों यह उनके घर का ही मंगल कार्य है और यजमान सबके मान-सम्मान, सुख-सुविधाओंका ध्यान रख रहें है!
विनायकराव पाटील जी तथा उनकी धर्मपत्नी प्रतिभा जी की यहीं तो खूबी थी! समाज में होने वाले समारोहों में लक्ष्मी जी का वरदहस्त तो होता हैं लक्ष्मीपतियों पर मगर अक्सर वह प्यार, अपनापन और आतिथ्य की मधुरता महसूस नहीं होती जो समारोह को चार चाँद लगा देती हैं, उसे अति-विशिष्ठ बना देती हैं!
अतिथियों के चेहरे पर संतुष्ठी का भाव देख़ आबा और प्रतिभा जी बहुत आनंदित थे! कृतज्ञता के बोझतले दबा उनका व्यक्तित्व आज भार-विहीन हो कर अपने स्वाभाविक रूप में सबको सम्मोहीत कर रहा था जो अतुलनीय था, अलौकिक था...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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