ये प्यार ही तो ज़िन्दगी.. भाग ७२
भाग ७२

भविष्य के गर्भ में क्या है यह तो किसी को पता नहीं होता हैं लेकिन आज को देख कर कल का अनुमान लगाना समझदारी भरा कदम ही कहलाता हैं। अप्पा के प्रयासों से एक स्वप्न मूर्त रूप ले रहा था और मित्र-मण्डली उसमें अपना योगदान देने को आतुर थी। 

ज़िन्दगी में ऊपरवाला बार-बार मौका नहीं देता। जब भी मौका मिले उसे झपट लेना चाहिए और मित्र-मण्डली ने वहीं किया। माना कि अब परीक्षा का समय था, विभा और यश को चयन के लिए खेल की प्रैक्टिस भी करनी थी लेकिन ऐसा मौका उन्हे कब मिलता अपनी क्षमता का प्रदर्शन करने का और वह भी अपनों के बिच! आखिर क्या काम का वो ज्ञान, जो देश के लिए, अपनों के लिए और समाज के लिए काम न आएं?

मित्र-मण्डली के लिए यह अद्भुत और अतुलनीय मौका था और उन्होंने अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुएं उसे सहर्ष स्वीकार भी कर लिया था। काम का काम, प्रशिक्षण का प्रशिक्षण और घी गिरेगा भी तो अपनी ही थाली में! 

अप्पा का उन्हें जिम्मेदारी सौंपना किसी बहुमूल्य प्रशस्तिपत्र से कम नहीं था। मित्र-मण्डली के ह्रदय में आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा हुआ था। 

विभा और यश के लैपटॉप साथ ही थे। कार्यक्रम सम्पन्न हो चूका था और मुंबई के लिए निकलना था। सभी ने शाम के छ: बजे निकलने का मन बना लिया था। अप्पा ने पुरी-भाजी, गुलाब जामुन, मिक्स नमकीन तथा कांदा भजी साथ में पैक कर दे दिए थे। अप्पा ने सभी को श्रीफल और माँ सरस्वती की छोटी सी चाँदी की प्रतिमा भेंट स्वरुप दी थी। सभी अप्पा और पद्मावती जी की मेहमाननवाजी से बहुत खुश थे।  

कराड का कृष्णा माई का नदी का किनारा अभी भी सबके मन में हुलारें ले रहा था। सभी मेहमानों ने अप्पा का धन्यवाद किया, उन्हें भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी तथा हाथ जोड़ सभी से विदा ली।

'ट्रैवलर' गाड़ी मुम्बई के लिए निकल चुकी थी। सभी के मन जरूर अभी भी कृष्णा के तट पर भटक रहे थे। विशाल ह्रदया कृष्णा माई की कृपा-दृष्टी के सभी कायल हो गए थे।  प्रकृति की गोद में बसा गाँव, शांत नदी का विशाल पात्र, 'प्रीति संगम' ज़हाँ दो नदियाँ हाथ में हाथ डालकर कर आगे बढ़ रही हो, संस्कृति-सभ्यता का शंखनाद करता विस्तृत किनारा और आध्यात्मिक शक्ति का एहसास कराता कृष्णमाई का भव्य-दिव्य मन्दिर... स्मृतियों के कोरे पन्नों पर हमेशा के लिए मुद्रीत हो चूका था। वहाँ के लोगों का स्फटिक सा निर्मल प्रेम, शुद्ध-सरल मन और दिल की गहराइयों से किया गया आदर-सत्कार मन को चन्दन सा सुरभित कर रहा था।

गाड़ी गाँव से बाहर निकल कर राष्ट्रीय महामार्ग पर पहुँच चुकी थी। सभी थक चुके थे। नींद भी कितनी नटखट-अड़ियल बच्चें सा बर्ताव करती है। एक दिन उसकी समयसारिणी का अनुसरण नहीं किया कि दूसरे ही दिन बेवजह अपना फुला हुआ मुँह लेकर नखरे दिखाने लगती हैं। तमाम सुविधा के बावजूद नींद में खलल पड़ने के कारण सभी सुस्त और मौन थे। 

वैसे भी कार्यक्रम की शुरुआत में जो उत्साह और जोश होता हैं वह कार्यक्रम के सम्पन्न होने के बाद ढीला तथा कमजोर पड़ जाता जैसे किनारे की तरफ बढ़ता हुआ तूफान! यहीं हाल सभी मुम्बईकरों का था। सभी खुद को खाने-पीने में व्यस्त रखना चाहते थे ताकि न उन्हें नींद की झपकी आएं न गाड़ी के ड्राइवर को।

सभी ने कोशिश तो बहुत की लेकिन जीवन का अर्ध शतक पार कर चुके बड़ों के लिए यह मुश्किल काम लग रहा था। 

निंदिया रानी को जब भी हम आने से रोकने की कोशिश करते हैं, वह जबरन हमारे मानस क्षेत्र में घुस जाती हैं और पूरे मस्तिष्क पर कब्ज़ा कर लेती हैं। कभी-कभार जब हम उसे दिल से आमंत्रित करते हैं तो वह यहाँ-वहाँ की बात कर हमें बहलाती रहती हैं। बड़ी तुनकमिजाज होती हैं यह निंदिया रानी! जीतना उसके पीछे पड़ो, वह आगे-आगे भागती हैं और जब उसे नजरअंदाज करों, तितली सी हौले से आ कर पलकों पर बैठ जाती हैं!

इस बार भी प्रताप सिंह जी को 'जागते रहो' का परचम थमा कर सभी खर्राटे लेने लगे। इक्का-दुक्का किसी की नींद खुल जाती, "कहाँ हैं हम?" पुछ कर वह फिर से सो जाता। ऐसे माहौल में सिर्फ एक ही व्यक्ति खुश था और वह था गाड़ी का ड्राइवर! उसके लिए अब गाड़ी चलाने पर ध्यान देना आसान हो गया था! 

एक घाट पार हो चूका था। सभी चाय-नाश्ता करने बैठ गए। कुछ हल्का हो कर आएं तो कुछ खुली हवा में टहल कर, वॉशरूम जा कर, मुँह पर पानी मारकर लौट आएं। सभी को भूक लगी थी। नाश्ते के पैकेट खुलते ही सभी उस पर टूट पड़े! भूक लगी हैं तो शर्माना क्यों  ? वैसे भी खाली पेट ज्ञान की बातें हजम कहाँ होती हैं?  

कांदा भजी तो चाय के साथ सब चट कर चुके थे। अब रात के खाने का इंतज़ार था। सभी गाड़ी में सवार हो गए और लोनावला जा कर भोजन करने का प्लान सर्वसम्मति से पास हो गया। 

अब घाट शुरु हो चूका था। बिच में हुए लैंड स्लाइडिंग की वजह से ट्रैफिक जाम था। रेंगते-रेंगते गाड़ी घाट पार कर गई थी। गाड़ी फिर दौड़ने लगी। टनल के अंदर से गुजरते हुए एक अलग ही आनन्द की अनुभूति हो रही थी।  इस बिच सभी खाना खाना भूल गएं थे। अब खालापुर का इंतज़ार था। आधे घण्टे के भीतर सभी खालापुर पहुँच  गएं थे। सभी ने वहाँ खाना खाया। पुरी-भाजी बहुत ही स्वादिष्ट बनी हुई थी और साथ में चटपटा मिर्ची का ठेचा! यह माँ अन्नपूर्णा देवी की कृपा थी कि सभी की आत्मा अब संतुष्ट हो गई थी। 

नींद कोसों दूर भाग गई थी और नवी मुम्बई का ब्रिज दिखाई देने लगा। यादों के प्रवासी परिंदे झुण्ड में करीब आने की कोशिश कर रहे थे लेकिन मित्र-मण्डली ने उन्हें दुत्कार कर वापस भेज दिया था। वो डरावना मंजर वो यादों में भी वापस देखना नहीं चाहते थे! 'ट्रेवलर' दौड़ रही थी और यादों के परिंदे कुछ दूर तक साथ निभा कर लौट चुके थे। अब एक-एक कर घर के सामने उतर कर बाय-बाय कर रहा था और कल मिलने का वादा कर अपने गतंव्य की ऒर बढ़ रहा था। यश का परिवार, लाली, विभा सब उतर चुके थे। अब जानकी जी, वैदेही और वज्र ही बाकी थे। वज्र ने सबको अपने यहाँ रुक कर सुबह घर लौटने को कहा। जानकी जी भी उसकी  प्यारभरी विनती को टाल न सकी। सभी घर पहुंचे तब तक छोटू और अन्नपूर्णा ने चाय-पानी की व्यवस्था कर सब के लिए बिस्तर लगा दिए थे। वैदेही और जानकी जी दिवाणखाने में सोफा पर गद्दे लगा कर सोई और वज्र अपने कमरे में।

सभी इतने थक गए थे कि नर्म मुलायम गद्दे का स्पर्श होते ही सभी सपनों की गठरी साथ लेकर स्वर्ग लोक की सैर करने लगे ....

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में...


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