आज शौर्य का अंतिम पेपर था! तीन दिन के भीतर उसे पुणे सैन्य अकादमी में पहुंचना था! रश्मि की परीक्षा तो हप्ते भर पहले ही ख़त्म हो चुकी थी! वह शाम को जेसीका के साथ घूमने निकलती और अंत में शौर्य को मिलकर, उससे बात कर ही घर लौटती! दो दिन पहले ही उसने शौर्य का सारा सामान समेट लिया था! बाहर सिर्फ दो-तीन दिन के लिए इस्त्री किए हुए कपडे, कुछ किताबें और बाकी निहायत जरुरी सामान ही था| कॉलेज के गुलमोहर के पेड़ के नीचे वह शौर्य का इंतज़ार कर रही थी! शौर्य भी जल्दी-जल्दी दोस्तों को अलविदा कह कर निकल पड़ा था! उसके सभी पेपर अच्छे हुए थे... अब उसे अपनी मंजिल की ऒर बढ़ना था...
रश्मि को देखते ही उसने बाइक रोकी और दोनों चल पड़े कृष्णा-कोयना के घाट की तरफ!
विठ्ठल-रखुमाई के मन्दिर में जा कर उन्होंने दर्शन किए और चरणों में फूल चढ़ा कर निकल पड़े शांत जगह की तलाश में कृष्णा माई की ऒर...
रश्मि जानती थी इस ऒर बहुत कम लोग आते हैं! लोगों का मानना था कि यहाँ भंवर हैं... उसमें से निकलना अभिमन्यु के चक्रव्यूह भेद कर निकलने जितना ही मुश्किल था! एक विशाल टिले को देख दोनों वहाँ बैठ गएँ!
अश्रुभरे नयनों से रश्मि बोल पड़ी, "शौर्य! तुम्हारे बिना कैसे जिऊंगी मैं? पल-पल कांटने को दौड़ेगा मुझे!
"पगली! तू तो मेरी 'बोल्ड & ब्यूटीफुल' है! यह तो सिर्फ शुरुआत है...अभी से हार मान लोगी?" उसे अपनी ऒर खिंचते हुएं शौर्य बोल पड़ा, "हम एक-दूसरे की ताकत है, कमजोरी नहीं! मंज़िल पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ेगा ही न"
रश्मि सब कुछ समझ रही थी लेकिन शौर्य के विरह की कल्पना मात्र से ही उसकी आँखें भर आती थी!
"क्या मुस्कुरा कर विदा नहीं करोगी? ये लो मेरा फोटो! जब भी तुम्हें मेरी याद आएगी, इसे ज़ी भर कर चूम लेना!" शौर्य बोल पड़ा और दोनों बाइक पर सवार हो घर की ऒर निकल पड़े!
दिन-महीने बीत रहें थे! पत्र लिख कर शौर्य ने बता दिया था कि उसका भारतीय सेना में सिलेक्शन हो गया है और कडी ट्रेनिंग की वजह से हो सकता है, उसे समय न मिले चिट्ठी लिखने का ... उसे ट्रेनिंग के लिए दूसरी जगह जाना पड़ रहा है.. वहाँ चिट्ठी लिखना मुमकिन हो, न हो.. बाय बाय.. माय बोल्ड & ब्यूटीफुल..लव यू..
एक तरफ शौर्य से सम्पर्क कम हो रहा था और दूसरी तरफ रश्मि का रूप दिनोंदिन निखर रहा था! माँ की पारखी नज़र कुछ अलग ही इशारा कर रही थी! आखिर माँ ने पूछ ही लिया! " बेटा! क्या बात है? शौर्य की क्या खबर है? शरीर दमक रहा है लेकिन वह चमक चेहरे पर दिखाई नहीं दे रही? क्या शौर्य की बेरुखी से चिंतित हो? "
रश्मि समझ नहीं पा रही थी यह सब माँ कैसे जान गई? ये शरीर का बढ़ता उभार, ये चमक.. कहीं...मैं..
आशंका के बादलों के बिच गड़गड़ाहट करती सौदामिनी का आभास उसे डरा गया... वह सिहर उठी! पास के ही मेडिकल शॉप से उसने प्रेगनेंसी टेस्ट की किट खरीद ली और ख़ामोशी से अपने कमरे में चली गई!
टेस्ट के पॉजिटिव नतीजे देख उसके पैरों तले से जमीं खिसक गई! माँ यह तो जानती थी कि वह शौर्य से प्यार करती है.. पर यह बिनब्याही माँ का तमगा उसकी बेटी के वक्ष पर देख क्या गुजरेगी उस पर... चिंता चिता का रूप धारण कर चुकी थी और वह खुद को असहाय, कमजोर महसूस करने लगी थी लेकिन अगले ही पल उसने मन में निश्चय कर लिया... मैं जन्म दूंगी इस बच्चे को.. मेरे शौर्य की निशानी को, हमारे प्यार के प्रतीक को...और वह चेहरा धो कर, बाल संवार कर माँ के कमरे में चली गई!
माँ माता की आरती उतार रही थी.. वह भी उसके साथ हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई! माँ! शक्ति दे मुझे! मेरा विश्वास बनाये रखना माँ! मेरा शौर्य मुझे कभी धोका नहीं दे सकता...
आरती के पश्चात उसने सारी बात माँ को बताई! माँ कुछ पल के लिए नि:शब्द हो गई! वह गंभीर मुद्रा में बोल पड़ी, "बेटा! बहुत मुश्किल होता है बिनब्याही माँ का अपने बच्चे को जन्म देने से लेकर पाल-पोस कर बड़ा करना, पढ़ाना- लिखाना, काबिल बनाना! क्या शौर्य का पत्र आया? चार महीने हो गए हैं वहाँ जा कर... शुरू-शुरू में तो ठीक था लेकिन अब तो बिल्कुल ही बंद हो गया है न बेटा उसका तुझसे संपर्क करना.. " माँ अपनी बात ख़त्म करती उसके पहले ही रश्मि बोल पड़ी... "माँ कुछ तो मज़बूरी रही होगी उसकी... माँ! इसके लिए भी मैं ही जिम्मेदार हूँ! मैं ही खुद पर काबू नहीं रख पाई... माँ! वह धोका नहीं दे सकता! मैं जानती हूँ उसे..."
"बेटा! तेरे मुँह में घी-शक्कर! पर यह दुनिया को कौन समझायेगा! एक काम करते हैं.. शिमला में मेरी एक सहेली रहती हैं.. बहुत खास! हम वहाँ चलते हैं... तुम बच्चे को जन्म दे देना...कोई पूछेगा तो हम यहीं कहेंगे, उसके पिता सेना के सीक्रेट मिशन पर गए हुए हैं..."
रश्मि की आँखों से आँसू बह रहें थे.. हे प्रभु! तेरा लाख-लाख शुक्रिया!
रश्मि एक बिनब्याही माँ बन चुकी थी! कृष्णा-कोयना का साथ छूट चूका था और हिमाचल प्रदेश की रंगबिरंगे फूलों से लदी वादियाँ अब उसका आशियाना बन चुकी थी! प्रकृति माँ के आँचल तले वह और उसका लाडला पल रहा था! उसे देखते ही रश्मि और बेचैन हो जाती! जब भी वह हँसता, उसे लगता, शौर्य ही हँस रहा है और उसे मानों कह रहा हैं, "बोल्ड & ब्यूटीफुल! मुझे पता हैं तुम इतनी जल्दी हार नहीं मानोगी"
समय पँख लगा कर उड़ रहा था! रश्मि ने बच्चे का नाम धैर्य रक्खा था! धैर्य का अर्थ रश्मि से ज्यादा भला कौन जान पाता? नानी का तो वह चलता-बोलता खिलौना था!
एकल अभिभावक का दर्द क्या होता हैं रश्मि अब समझ पा रही थी! माँ की कड़वी बातों की मिठास का एहसास उसे अब महसूस हो रहा था !
धैर्य अब प्ले-स्कूल में जा रहा था! माँ और नानी की जान उसमें बसती थी..
रश्मि की माँ ने अब जँवाई का मुख देखने की आस छोड़ दी थी! माँ हमेशा कहती थी, " मेरा जंवाई राजा घोड़े पे बैठ कर आएगा तो सब कहेँगे.. कहाँ से ढूँढा हैं यह राजकुमार.." पर अनजाने में रश्मि ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था!
लेकिन रश्मि... उसका विश्वास अटल था फलक पर चमकते ध्रुव तारे सा...
बड़ी जद्दोजहद के बाद भी रात को नींद नहीं आ रही थी रश्मि को....धैर्य तो कब का माँ से लिपट कर सो चूका था.. रश्मि ने न्यूज़ चैनल शुरू किया! पद्म पुरस्कार वितरण कार्यक्रम का रिकॉर्डिंग दिखाया जा रहा था... तभी शीशे से चीरते शब्द रश्मि के कानों में पड़े... "जम्मू से ले. कर्नल शौर्य वर्मा, अद्भुत पराक्रम और वीरता दिखाते हुए इन्होने तीन आतंकवादियों को मार गिराया! खुद गोलियों से जख़्मी होने के बावजूद भी वे लक्ष्य से पीछे नहीं हटे और भारी जान-माल की क्षति से देश को बचाया! उनके अतुलनीय कौशल और जीवट को नमन करते हुए उन्हें पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया जाता हैं... तालियों की गडगड़ाहट के साथ स्वागत कीजिये... देश की रक्षा में अपने दोनों पाँव गंवा चुके, अदम्य साहस के धनी कर्नल शौर्य वर्मा का....
यह सम्बोधन सुनते ही रश्मि दौड़ कर माँ के कमरे में पहुँच गई! उसके नयनों से बिखरे आँसुओं की बूंदों ने माँ की नींद तोड़ दी! जैसे ही माँ उठ कर बैठी, वह माँ को लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगी... माँ! शौर्य जम्मू में हैं! मैं नहीं कहती थी... वह धोखा नहीं दे सकता! मेरी ज़िन्दगी बचाने के लिए उसने अपने परिवार को कुर्बान कर दिया..
माँ कल ही हम दिल्ली जाएंगे! वहाँ मिलेंगे हम शौर्य और उनकी माताजी से ..बहुत सहा है माँ-बेटे ने....कितनी खुश होगी वह अपने पोते को देख कर...ठीक है न माँ?
बिनब्याही माँ की पीड़ बूंद-बूंद बरस कर माँ के आँचल को भीगो रही थी और बदरी अपनी बदकिस्मती पर रो-रो कर धरा का अँचल गीला कर रही थी...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |
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