मेरा काव्यात्मक परिचय!

कुन्दन, घिसुलाल के प्रणय बेल पर खिला मैं "कुसुम",

चहके परिंदे, महकी फिज़ा, जीवन में आया बहारों का मौसम,

जन्मस्थली आरकाट, तमिलनाडु का छोटा सा ग्राम,

शादी की दावत में, "लक्ष्मी आई, लक्ष्मी आई" का नाम!

बजी थालियां, बंटी मिठाईयां, महफ़िल में छलका खुशियों का जाम!

 

शूरता, दानवीरता, भामाशाह की अमूल्य थाती!

महाराणा की जन्मस्थली, कुंभलगढ़ समीप पुरखोंकी धरती!

विश्वविख्यात राणकपुरजी, नौ कोस सादडी, पुर्वजों की बस्ती!

अरावली की पर्वत श्रृंखला, टुहुंके मोर, दूर भीलों की बस्ती!

 

हिंदू हृदय सम्राट, छत्रपति शिवाजी, वीरता की परिपाटी!

कर्मभूमि महाराष्ट्र, सह्याद्री की कठोर, दुर्गम घाटी!

बचपन का गोकुळ, यौवन का वृंदावन, मेरी रोजी-रोटी!

पली-बढ़ी खेली-कुदी मैं, इसी धरा ने दिखाई उतुंग चोटी!

 

शिक्षा-दीक्षा, शादी-ब्याह, वंश वेल पोषित, इसी जमीं पर!

नन्हा सा परिवार, "हम दो, हमारे दो" में परिपूर्ण संसार!

कर्मयोग हमारा, सुखी जीवन का बना मजबूत आधार!

पुरखों की विरासत, संस्कारों की थाती पर गर्व अपार!

 

अपनी शर्तों पर, खुद्दारी से, जी हैं सदा जिंदगी !

न गिले-शिकवे-गम-मलाल, दिल से बंदगी!

महको, खुशियां बांटो, खुल के जियो जब तक होश!

"जियो और जीने दो" यही सदैव रहे जीवन घोष!

इस पर लोग क्या कह रहे हैं