फैसला
डोर बेल लगातार बज रही थी। उठकर खोलने का मन ही नहीं था पद्मा का। प्रमोद से झगडा हुआ था उसका।
"क्यों मेरी जिंदगी के अहं फैसले प्रमोद लेना चाहता हैं?"
"क्या मैं अपनी मनमर्जी से कुछ भी नहीं कर सकती?"
अतीत की यादों में खो गयी थी वह।
कैसे रिद्धि का नाम वह रश्मि रखना चाहती थी, लेकिन प्रमोद ने अपनी मर्जी से रिद्धि रखा था। बडी होकर वह क्या बनेगी? किसके साथ वह घुमने जा सकती है? किससे मित्रता करे...सबकुछ वही तय करते थे। लेकिन अब वह बड़ी हो गयी है। अपने जिंदगी के फैसले खुद ले सकती है।
आज तो हद हो गयी।
राकेश को अपना जीवन साथी बनाने का रिद्धि का फैसला सुन प्रमोद अपना आपा खो बैठा। गुस्से में जैसे ही उसने हाथ उठाया, बिच में ही रोक दिया उसने। रिद्धि ने भी फैसला सुना दिया अपना और तमतमाते बाहर चली गयी।
दोनों की बहस झगडे में परिवर्तित हुई।
प्रमोद भी दरवाजा जोर से पटक बाहर चले गये। पलभर किंकर्तव्यमूढ सी देखती रह गयी वह। अनहोनी की आशंका से आँखे बरसने लगी। रोते रोते आँख लग गयी थी उसकी। और बेल की आवाज से एकदम उठकर बैठ गयी।
दरवाजे में बेहाल से प्रमोद को खड़े देख बिना बतियाये अंदर आ गयी और गुमसुम सी सोफे पर बैठ गयी। रिद्धि का फोन स्विच ऑफ आ रहा था। डर के मारे हिचकियां बंध गयी थी उसकी। प्रमोद भी अपने व्यवहार से शर्मिंदा थे।
मित्रगण से संपर्क कर राकेश का नंबर मिला।
" नमस्ते आंटीजी। रिद्धि बिल्कुल ठीक है। घर वापसी के लिए मनाते अब राजी हुई है। मैं उसे लेकर आ रहा हूं। आप चिंता न करे।"
" और जब तक आप आशीर्वाद नहीं देंगे, हम शादी नहीं करेंगे।"
आप मुझे गलत न समझे।
आपके आशीर्वाद मिलेंगे यही आशा है।" राकेश की बातें सुनकर प्रमोद की भी आँखें नम हो गयी। भगवान के सामने हाथ जोड शुकराना अदा करने लगे। सोच लिया उन्होंने अब अपने फैसले वे किसी पर भी नहीं लादेंगे।
स्वरचित मौलिक लघुकथा
चंचल जैन
मुंबई, महाराष्ट्र