मासूम जिन्दगी रवि ने अभी- अभी दसवीं पूरी कर ली थी। अपने प्रदेश में उसने जिले में टॉप किया था। अपने चाचा के लड़के को देखकर ही उसे इंजीनियर बनने का ख्वाब मन में आने लगा था। उसने इस विषय के बारे में अपने भाई से चर्चा की तो वह उसपर खुश होते हुए कहने लगा, " रवि, मुझे बहुत खुशी हुई कि तुमने पूरे गाँव का नाम रोशन किया और उससे भी बड़ी खुशी की बात यह है कि तुम इंजीनियर की पढ़ाई करने वाले हो। मैं तो तुम्हें यही सलाह दूंगा कि तुम जेईई की परिक्षा की तैयारी करने कोटा शहर अभी से चले जाओ और शुरुआत कर दो पढ़ाई की  , वहाँ के बच्चे बाहर निकल कर अपने आप को आत्मविश्वास से परिपूर्ण मानते है साथ ही उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए कोई कठिनाई भी नहीं होती। आगे का रास्ता आसान हो जाता है। " 

रवि को उसके भाई के बात पर विश्वास हो गया कि वह जो बातें कर रहा है अपने अनुभव से, उसे जिन मुसीबतों का सामना करना पड़ा वो मुझे ना हो इसी चिंता से वह मुझे ये मशवरा दे रहा है। वैसे उसकी पारिवारिक स्थिति भी अच्छी थी तो चिंता की कोई बात नहीं। रवि ने ये बात अपने पिताजी के समक्ष रखी तो पिताजी ने उसे हां कर दी। 
                                                            
बच्चे की इच्छा के कारण भारी दिल के साथ छोटी सी उम्र में ही रवि को अपने से दूर कर दिया। वहाँ का माहौल कुछ अजीब सा था, रवि अपने आप को इस माहौल में ढालने की कोशिश करने लगा। बचपन से उसे आदत नहीं थी, घंटे - घंटे पढ़ाई की बावजूद भी दूसरे बच्चों की देखा - देखी में ये आदत डाल ली। दिन के दो - तीन घंटे पढ़ाई करनेवाला रवि अब आठ से दस घंटे पढ़ने लगा। दूसरे बच्चों से आगे चलने की होड़ में और अपने सपने को पूरा करने की आशा में वह अपने बचपन को भूल ही गया। सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई यही उसके जीवन का अंग बन चुका था। हप्ते के सात दिन कक्षा में पढ़ाई और इतवार के दिन परीक्षा, इन कारणों से वह चैन न पाता पढ़ाई से। इम्तिहान, गुणों और रैंक के सिवा कोई बातें न होती थी बच्चों के साथ। फुरसत ही कहाँ जो अन्य बातें एक- दूसरे के साथ कर सकते। सुबह सात बजे से दोपहर दो - तीन बजे तक एक के एक विषय कुछ ही क्षणों के अंतराल के साथ पढ़ाए जाते हो और उसके पश्चात घंटेभर के बाद लाईब्रेरी में जाकर अपना सिर किताबों में लगा देते हो तो कहाँ उन्हें आराम और शांति प्रदान हो पाएं। 

जितना रवि ने सोचा था, उतना आसान था नहीं ये कदम। हर तरफ पढ़ाई और पढ़ाई। उसके सिवा कोई दूसरा जीवन ही नहीं। रवि ने हिम्मत नहीं हारी और वह लगातार पढ़ने लगा। कुछ सालों बाद जब इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा हुई तो फिर से वह अपने क्षेत्र में अव्वल आया और उसका दाखिला एक अच्छी संस्थान में हो गया। पढ़ाई के खत्म होते ही बड़ी तनख्वाह की नौकरी उसे प्राप्त हो चुकी थी। सारा गाँव उसके इस परिश्रम से खुश था, पूरे गाँव का नाम रोशन कर दिया। इतनी दूर शिक्षा के लिए जाकर ही उसने यह सब हासिल किया है, यह बात समाज के लोगों के मन में बैठ गई , उसकी देखा - देखी में बिरादरी तथा गाँववालें  बच्चों के मन में आशा की चमक आ गयी। 

कई सारे बच्चों ने इसी आस में खुद को वहाँ अपने आप को ढकेल लिया कि एक न एक दिन मैं भी ऊंचा ओहदा प्राप्त कर अपने गाँव का नाम रोशन करूँगा। 

तीनों भाईयों ने मेडिकल की पढ़ाई के लिए दाखिला ले लिया, अपनी और अभिभावकों की इच्छा को पूरा करने के लिए। इस माहौल में अपने आप को ढालने की सबसे बड़ी चुनौती रहती है, हर बच्चे की। 

उन तीनों भाईयों में जिसका नाम शेरिल था, वह अपने दूजे भाईयों के मुकाबले थोड़ा कमजोर था तो उसके भाईयों का प्रवेश दूसरी कक्षा में होने के कारण वह खुद को कमजोर समझने लगा, साथ ही उसके जहन में नैराश्य के भाव पनपने लगे। अपने माँ- पिता की अपेक्षा, भाई की जीत तथा समाज के लोगों की बातें और ताने इन समस्याओं की चिंताओं से वह हरदम घिरा रहता। उसे समझ में न आता था कि वो अपनी बात कैसे परिवारजनों के समक्ष रखें। 

शेरिल की लाश पंखे पर लटकी देखकर सब दंग थे। हो भी क्यों नहीं अचानक से इतने होशियार छात्र ने अपने आप को खत्म कर दिया, आखिर ऐसी क्या बात हुई इन दो - चार महीनों में कि बच्चे ने खुदकुशी कर ली। जरा भी नहीं सोचा कि इस बात से कितनी पीड़ा होगी सब परिजनों को। एक हंसती- खेलती मासूम जिंदगी मौत को आलिंगन कर लेती है इसका कसूरवार आखिर कौन है? यह एक चौकानें वाला और कालजयी प्रश्न है ?  शिक्षा व्यवस्था का दोष है या ईर्ष्या का?

मंथन विनायक देवरे " हिम "

द्वारा MANTHAN DEORE
Shared27 Feb 2025
Start 27 Feb 2025
End 27 Feb 2030
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