मनहरण घनाक्षरी में,सादर समीक्षार्थ...
तुम प्रीत, तुम गीत,
सखा श्याम, मन मीत,
कान्हा संग कैसी जीत,
बन्धन सारे हटे!
कालिंदी किनारे रास,
भीगी-भीगी मन आस,
मुरली में राधा वास,
प्यासी ही रैना कटे !
काहे खेले लुका-छुपी,
छीने वस्त्र कर्म रूपी,
खोले भाग्य मोक्ष कुप्पी ,
रसिया राधा रटे!
विष्णु अवतार श्याम,
पीड़ हरे हरि नाम,
धर्म रक्षा मुख्य काम,
कुकर्म लेखा घटे!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई