पिता-दीपस्तम्भ!

 

शीर्षक : पिता-दीपस्तम्भ!

कितने अरमानों से पाला-पोसा था हमें पिता ने! खुद को दीपस्तम्भ सा उफ़नती लहरों के बिच मजबूती से खड़ा रख कर बच्चों के सपनों को नया क्षितिज देना उनका एकमात्र लक्ष्य था! अपने अरमानों का गला घोंट-घोंट कर हमें उड़ने को नीला, विस्तीर्ण अम्बर देना चाहते थे वो!
सुदूर गाँव से दसवीं तक पढ़कर शहर आए किशोर के लिए आसान नहीं थी यह चुनौती! मुंछे भी अभी निकली नहीं थी कि परिवार का बोझ आ गया था उनके कंधों पर! दादाजी के बिना बताएं अचानक घर से निकल जाने के कारण उनके सिर से पिता का शामियाना मानो वक़्त की आँधियो में उखड़ कर अस्तव्यस्त हो गया था! कमानेवाला एक और खानेवाले दस! एक बंदा करे भी तो क्या-क्या करे? बूढ़े दादाजी को बर्तन की  दुकान चलाने में मदद करना और अपनी पढ़ाई आगे जारी रखना, अपनी माँ, भाई-बहन, पत्नी और बच्चों का उत्तरदायित्व निभाते-निभाते पढ़ना सपनों को हकीकत के धरातल पर उतारना आसान तो बिल्कुल ही नहीं था लेकिन पढ़ने की जिद्द और कुछ कर गुजरने की जिजीविषा के आगे तमाम मुश्किलों ने, अवरोधों ने घुटने टेक दिए और पिताजी ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की पदवी हासिल की! 
सफलता का जश्न मनाने को फुरसत किसे थी? जिम्मेदारियां मुँह फैलायें खड़ी थी! उन्होंने कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी स्वीकार की और शहर की चुनौतियों का सामना करते-करते वह परिवार का गाड़ा आगे-आगे खींच रहें थे! 
यह वह दौर था जब उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए सात-समंदर पार जाना पड़ता था! मेधावी छात्र होने के कारण वह भारत सरकार की शिष्यवृत्ति पर ढ़ाई साल के लिए पश्चिम जर्मनी चले गए और विदेश से लौटे तो कण्ट्रोल सिस्टम में मास्टर्स की डिग्री लेकर!
एक प्रोफेसर पिता के  होनहार बच्चें थे हम! तीन पुत्रियाँ और तीन पुत्र! सबको शिक्षा-दीक्षा देना कोई आसान काम नहीं था पर पिताजी ने सबको उच्च शिक्षा से मालामाल कर अपने पैरों पर ख़डा किया!
बच्चें दुनियादारी के लिहाज से कच्चे, अभी भी बच्चे ही थे पर शिक्षा-दीक्षा से परिपूर्ण थे!
माँ-पिताजी की दुनिया मानों हम ही थे! सारी जद्दोजहद हमारी बेहतरी के लिए ही थी! खुद झंझावातों से लड़ कर सूरज की रश्मियों से भरा आसमान हमें मुहैया कराया था उन्होंने!
खुद्दारी तो उनकी नसों में अनवरत बहते खून में घुली हुई थी! तमाम दुश्वारियों के बावजूद न कभी उन्होंने किसी के आगे हाथ फैलाएँ न किसी की खुशामद की! सादगी भरी ज़िन्दगी और ऊँची हिमालय सी सोच!
सच कहने में वह कभी हिचकिचाते नहीं थे! अपने स्वार्थ के लिए किसी की चाटुकारिता करना तो उनके जीवन-संहिता में ही शामिल नहीं था! ज़िन्दगी को अपने शर्तों पर जीते थे वह! बात अनुशासन की हो तो वो किसी की भी नहीं सुनते थे! भले ही सामने उनकी जीवन-संगिनी क्यों न हो!
हम छह बच्चों की परवरिश दोनों दिलों-जान से करते थे! उनकी दुनिया हमसे ही शुरू होती और हम पर ही  ख़त्म! वक़्त आने पर पिताजी हाथ में झाड़ू थामने में भी शर्म नहीं महसूस करते थे और कभी-कभार माँ बीमार होती तो उसकी सेवा करने में भी कभी उनकी पुरुषोचित अहंकारी मानसिकता आड़े नहीं आती थी! ज़िन्दगी में श्रम का महत्त्व हमने उनसे ही जाना! समय की कीमत करना वह बखूबी जानते थे! एहसानों के एहसास को जिन्दा रख कर उसे व्याज सहित चुकाने में माहिर थे वह! ज़िन्दगी के संघर्षों से वह डरे नहीं, हतबल होकर ठहरे नहीं! अपना काम खुद करना, अपनी जिम्मेदारी का बोझ खुद उठाना, तमाम विचार-विमर्श के बाद अपने निर्णय खुद लेना और अति महत्वपूर्ण बात.... उन निर्णयों के सही या गलत परिणामों को स्वयं सहर्ष स्वीकार करना उन्हीं से सीखा हमने!
उनका जीवन एक गुरुकुल था हमारे लिए! जीवन के अंधेरों में आज भी उनके आचार-विचार हमें आलोकित करते हैं,आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देते हैं, ऊँचे आसमान में उड़ान भरने का हौसला देते हैं! 
यह तो आनेवाला वक़्त ही बताएगा कि हम वक़्त की कसौटी पर पिता की उम्मीदों पर खरे उतरे या नहीं! 

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा |

इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • सुंदर संस्मरण। माता पिता के चरणों में शत शत वंदन।
  • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।