शीर्षक: सच्ची राह!
सच्ची राह पर चलना है,
तूफानों सें टकराना है!
प्रलोभन खड़े बाँह पसारे,
अनदेखा कर आगे बढ़ना है!
झूठ खड़ा हैं लट्ठ लेकर,
वज्र सा कठोर बनना है!
सच की राह में रोढ़े हजार,
मीलों नंगे पाँव चलना है!
स्वार्थ की बह रही गंगा,
कमल सा अलिप्त रहना है!
दलदल भले हैं चारों ऒर,
जल सतह पर मुस्कुराना है!
सच की राह सदा कंटीलीं,
शूल को चुम चलना है!
लहूलुहान कदमों के दम पर,
मंजिल को जिद्द से पाना है!
सच की राह चुनी है पथिक,
ठहरना मुमकिन नहीं सराय में!
लक्ष्य को कैद कर आँखों में,
सफलता का दीदार करना है!
कामयाबी है उनकी किस्मत में,
फल की चिंता से मुक्त जो!
सच्ची कोशिश-विश्वास के बल पर,
गंगा धरती पर लाया जो!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा।