नारी... एक लेखा-जोखा! कौन कहता है नारी अबला है, कमजोर हैं, लाचार है? 
एक माँ जो नौ महीने अपने बच्चे को अपनी कोख में पालती है, दर्द की असीम सीमा को लांघ कर उसे दुनिया दिखाती है, वह कमजोर कैसे हो सकती है? 
एक पत्नी, जो अग्नि के सामने फेरे लेकर, सात जन्मों तक, दुःख-सुख, धूप-छाँव, रात-दिन में अपने पति का साथ निभाती है वो 'बेचारी' कैसे हो सकती है?
रेशमी डोर से भाई की कलाई पर मजबूत रक्षा सूत्र बांधने वाली, विपरीत परिस्थितियों में ढाल बनकर खड़ी रहने वाली, राखी भेज कर शहंशाह को शांति का प्रस्ताव देनेवाली बहन दुनिया में लाचार कैसे हो सकती है?
परिवार की शोभा, घर की कस्तूरी, आँगन की तुलसी, घर की रौनक, बेटी क्या ससुराल जाने के बाद दोनों घरों को महकाने वाली, सिर्फ 'आँचल में दूध, आँखों में पानीं' लिए जिंदगी में सफलता हासिल कर पायेगी?
नारी न कभी कमजोर थी न है, न होगी! 

हाँ! वह झील में खिले कमल सी कोमल, सुंदर, मन-मोहिनी, मुसीबतों के कीचड़ में भी खुद की सुचिता बचाएं रखकर, मुस्कुराती नारी है जो अपनी रूहानी सुंदरता, निस्वार्थ ममता, अटूट प्यार, अतुलनीय त्याग और अभूतपूर्व समर्पण से सारे जहां को अपना कायल बना लेती है!
आज कौनसा ऐसा क्षेत्र है जहाँ नारी ने सफलता के झंडे नहीं गाढ़े है? अंतरिक्ष हो या अम्बर, धरा हो या समंदर, संगीत हो नृत्य, कला हो या विज्ञान , राजनीति हो या अर्थनीति, शिक्षा हो या व्यवस्थापन, धर्म हो शास्त्रार्थ, खेल का मैदान हो युद्ध की रणभूमि, कहाँ नहीं है नारी के कदमों के निशाँ? 
क्या शारीरिक, बौद्धिक या मानसिक रूप से कमजोर महिला ये कर सकती है?
आज हर क्षेत्र में महिलाएं अग्रणी स्थानों पर विराजमान है! ग्रामीण परिवेश की महिला हो या आधुनिक तेजतर्रार नारी, अनपढ़ हो या शिक्षित उसकी जिजीविषा, जीवट, मेहनत, लगन, समर्पण के किस्से गली-कूचे में गूंज रहे हैं! विपदा में विराट क्षमता का परिचय देती नारी के दर्शन क्या कोविड-19 की महामारी में भी विश्व को विस्मित करने के लिए काफी नहीं है? वक़्त आने पर हर मुसीबत को मौके में बदलने का हुनर स्त्री से बेहतर किस के पास है? उसकी सहनशीलता, परिश्रम और संघर्षक्षमता का कायल सारा विश्व है!
नारी जीवन का एक तरफ उजला पक्ष हैं तो दूसरी तरफ डरावना, दु:खदाई, शोषण-उत्पीड़न की चित्कार करता अंधेरा पक्ष भी है! घरेलू हिंसा, अन्याय, असमानता की शिकार आज शिक्षित-अशिक्षित, अमीर-गरीब, सभी उम्र, धर्म, जाति, संप्रदाय, देश की समस्त महिलाएं हैं! इस असमानता, अराजकता, अन्याय के अंधेरे से बाहर निकलने के लिए खुद नारी को ही अपने हाथों से शस्त्र-शास्त्र उठाकर धर्म-शील के रक्षा के लिए कभी खुद से तो कभी औरों से भी लड़ना पड़ेगा! आज के कलयुग में कोई श्रीकृष्ण उसे बचाने आएगा यह भ्रम भूल कर खुद ही को इतना बुलंद करना होगा कि कोई खल प्रवृत्ति का व्यक्ति उसके दामन पर, अस्मिता पर हाथ डालने की हिम्मत न कर सकें! समाज, संसार के आगे हाथ जोड़कर, घुटने टेक कर नहीं, आमने-सामने भीड़ कर मुकाबला करना होगा तभी आदि-शक्ति रूप को भूल बैठे लोगों को भी सिंह की सवारी करती नारी का असली रूप नजर आएगा! 

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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