२१-१-२०३६
#विषय शिक्षा का उजास, प्रगति का विश्वास
#विधा आलेख
विषय: शिक्षा का उजास प्रगति का विश्वास
हमारा सजग मंच सदैव सुंदर समसामयिक और समाजोपयोगी विषय देता है।
हमारे मंच के प्रभारियों की यही खास बात है, जो कि समाज के प्रति अपनी चिंता को चरितार्थ करता है और यही गुण चिंतकों व प्रबुद्ध लेखकों को आकृष्ट करता है।
राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के अवसर पर दिया गया यह विषय बहुत ही मननीय और चिंतनीय है। भारत को आजाद होने के इतने सालों बाद भी हमारे देश का बहुत बड़ा वर्ग शिक्षा क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है। ग्रामीण भारत को जानबूझकर शिक्षा से वंचित रखा गया था, ताकि अनपढ़ लोग भारत की शासन व्यवस्था में अपनी आवाज को बुलंद न कर पाएं और आम जनता सहती रहे।
हालांकि पिछले कुछ सालों में साक्षरता दर बढ़ी है, और मुझे उम्मीद है कि कुछ सालों में अधिकांश लोग शिक्षित हो जाएंगे। पर यह पर्याप्त नहीं है, देश का चरित्र का ग्राफ दिन प्रतिदिन नीचे आ रहा है। पाश्चात्य शिक्षा शैली ने हमारे युवाओं को भ्रमित किया है।
शिक्षा एक ऐसी अनूठी प्रक्रिया है जो किसी भी अबोध व्यक्ति की मानसिक क्षमता और सक्षमता को सींचकर उसे बाहर लाती है, और शिक्षा व्यक्ति के व्यक्तित्व को गुण सम्पन्न बनाती है बशर्ते शिक्षा का ढंग बेहतरीन हो।
मेरा मतलब है कि शिक्षा ऐसी हो जो विभिन्न विषयों के साथ विद्यार्थियों के सुंदर, शालीन चरित्र निर्माण पर भी जोर दे ऐसी होनी चाहिए।
स्कूल, गुरुकुल, कॉलेज ये स्थल हैं जहां अध्यापक, अध्यापिका, प्रधानाचार्य, प्राचार्य, विद्वान, विषारद, या कहें कि गुरुओं के द्वारा शिक्षा प्राप्त की जाती है। प्राथमिक कक्षाओं में भाषा ज्ञान और विविध विषयों का प्राथमिक ज्ञान लेकर कुछ विषयों में पारंगत बनना और विद्वता हासिल करना शिक्षा कहलाती है।
पर अभी शिक्षा के ढर्रे में काफी कुछ बदलाव की जरूरत है। ग्रामीण भारत में कितने स्कूल
ऐसे हैं जो कहने भर के लिए है, कहीं शिक्षक नहीं, तो कहीं कमरे नहीं, कहीं विद्यार्थी नाममात्र के हैं। जब तक लोग समुचित शिक्षा नहीं लेंगे, समुचित विकास नहीं होगा।
हमें देश के युवा धन को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी देने होंगे। एक क्लास मतलब पीरियड ऐसा होना चाहिए जहां विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा और निष्ठावान कैसे बनाएं, इसकी योजना बनाई जाए। जो विद्यार्थी अपनी निष्ठा और नैतिकता में खरा हो, समाजिक हो, नशा आदि न करें, ऐसे सौगंध पत्र पर साइन हो, उन्हें जॉब में प्राथमिकता दी जाए। यदि कोई सरकारी नौकर जीवन भर अपनी निष्ठा पर खरा उतरे, तो उसे सम्मान के साथ 10% भुगतान भी अधिक देना चाहिए। उसकी पेंशन दोगुनी कर देनी चाहिए।
प्राइवेट क्षेत्र में कोई शिक्षित आदमी अपने काम-कारोबार को प्रमाणिकता पूर्वक आगे ले जाए और अपने चरित्र पर जिंदगी में कोई दाग न लगाए, ऐसे व्यक्तियों को भी सम्मानित करने के साथ पारितोषिक दिए जाने चाहिए। साहित्य क्षेत्र में भी बेदाग और चरित्रवान व्यक्तित्व का सम्मान किया जाना चाहिए। तभी देश विकसित होगा और भारत के उजाले होंगे। तभी प्रगति होगी और विकास का विश्वास प्रगाढ़ होता जाएगा।
स्वरचित:अशोक दोशी