चाहिए....

थामने तलवार-कलम....
शेर-दिल चाहिए।
आँधी हो या तूफान...
हौसले बुलंद चाहिए।
दुश्मनों का करने खात्मा..
धार तेज चाहिए।
अन्याय, अपराध के विरुद्ध... 
आक्रोश कर्कश चाहिए।
कलम या कटार से..
दैत्य-मर्दन चाहिए।
कलम की स्याही में...
उम्मीदों का नूर चाहिए।
किताबों के पन्नों में...
छुपे मयूरपंख चाहिए।
पुस्तक की जिल्द पर, 
उभरता ज्ञान-सूर्य चाहिए।
समाज का दर्पण बन.. 
बुराइयों का तर्पण चाहिए।
कलम-किताब का..
समन्वय-सृजन चाहिए।
वीणावादिनी माँ शारदे की...
भक्ति-शक्ति चाहिए।
कलमकारों के माथे पर...
माँ सरस्वती हस्त चाहिए।
शब्द-शब्द में अंगार...
संवेदनाओं में खनक चाहिए।
लेखनी के अंकुश से..
अहं का गजराज वश में चाहिए।।

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, पवई, मुंबई, महाराष्ट्र
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